#सुरजापुरी पहचान पर राजनीति नहीं, सच्चाई जानिए: इंजीनियर अबुजर उस्मानी
सोशल मीडिया में ठाकुरगंज के विधायक Gopal Agarwal जी का एक बयान सामने आया जिसमें कहा गया कि “जिस सुरजापुरी का कोई पहचान तक नहीं बचा था, उसे मेरे बाबूजी ताराचंद धानुका ने जिंदा किया।”
यह बयान न सिर्फ तथ्यों से दूर है बल्कि सुरजापुरी समाज के इतिहास और अस्तित्व को भी छोटा करने जैसा है।
सुरजापुरी कोई ऐसी पहचान नहीं है जो खत्म हो गई थी और किसी एक व्यक्ति ने उसे जिंदा किया। यह सदियों पुरानी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है, जो सीमांचल और उत्तर बंगाल के लाखों लोगों की मातृभाषा है।
सुरजापुरी केवल ठाकुरगंज तक सीमित नहीं है। यह व्यापक रूप से इन क्षेत्रों में बोली जाती है:
📍 Kishanganj
📍 Purnia
📍 Katihar
📍 Araria
📍 Uttar Dinajpur
इन क्षेत्रों में लाखों लोग रोज़मर्रा की जिंदगी में सुरजापुरी बोलते हैं। कई भाषाई अध्ययनों के अनुसार 30–40 लाख से अधिक लोग इस भाषा का उपयोग करते हैं।
सच्चाई यह है कि सुरजापुरी पहचान को जिंदा रखने का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि इस क्षेत्र के आम लोगों, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जाता है, जिन्होंने सदियों से अपनी भाषा और संस्कृति को जिंदा रखा है।
अगर सच में सुरजापुरी समाज की भलाई की चिंता है तो असली मुद्दा यह होना चाहिए कि:
• सुरजापुरी भाषा को शैक्षणिक मान्यता मिले
• स्कूलों में इसे पढ़ाने की व्यवस्था हो
• सुरजापुरी संस्कृति और साहित्य को सरकारी समर्थन मिले
इतिहास और समाज की सामूहिक विरासत को किसी एक व्यक्ति के नाम कर देना न तो न्यायसंगत है और न ही सच के करीब।
सुरजापुरी किसी की देन नहीं, यह इस पूरे क्षेत्र की साझा पहचान और विरासत है।
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