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महिला दिवस के उपलक्ष्य में लेखिका डा. सय्यदा बेगम खान व कवयित्री कविता मधुर को स्त्री शक्ति सम्मान से किया सम्मानित



मेरठ - स्वतंत्रता सेनानी मास्टर सुंदर लाल स्मृति न्यास मेरठ के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में आज प्रो वेद प्रकाश बटुक के हापुड़ अड्डे स्थित निवास पर एक विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जनवादी लेखक चिंतक प्रो वेदप्रकाश बटुक ने की।विशिष्ट अतिथि गाजियाबाद से पधारे कहानीकार श्री भगवान दीक्षित रहे जबकि लेखिका डा सय्यदा बेगम खान तथा कवयित्री कविता मधुर की संस्था द्वारा स्त्री शक्ति सम्मान से सम्मानित किया गया ।उन्हें अतिथियों द्वारा शाल और माला पहनाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन कवि डा रामगोपाल भारतीय ने किया।
सर्वप्रथम युवा कवि उस्मान भारत ने देश की वर्तमान स्थिति पर विचार प्रस्तुत किए।बैंकर और कवि श्री मनोज भाटी ने भी आज महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार पर चर्चा की।कवि श्री धर्मपाल मित्रा ने देश को समर्पित सुंदर गीत प्रस्तुत किया।वहीं कवि मंगल सिंह मंगल ने जोशीली कविताएं सुनाई।आर्य समाजी कवि श्री धर्मपाल आर्य ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।डा सय्यदा बेगम खान ने नारी की दशा और दिशा पर सारगर्भित लेख पढ़ा। वहीं कवयित्री कविता मधुर ने सुंदर कविता सुनाकर श्रोताओं की वाह वाही लूटी।पत्रकार लेखक श्री शाहिद ए चौधरी ने बसंत और भारतीय महिलाओं की स्थिति पर रोचक व्यंग्य प्रस्तुत किए।जनवादी लेखक संघ के सचिव एडवोकेट श्री मुनेश त्यागी ने विश्व में साम्राज्यवाद के खतरों और महिलाओं की दयनीय स्थिति पर विचार रखते हुए सांप्रदायिक सद्भाव पर एक कविता भी प्रस्तुत की कहानीकार श्री भगवान दीक्षित ने एक कहानी सुनाई और समाज के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार प्रकट किए।डा रामगोपाल भारतीय ने समसामयिक विषय पर एक गीत प्रस्तुत किया।अंत में कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो वेदप्रकाश बटुक ने कहा कि आज मेरा कुछ भी कहने का मन नहीं है।क्या कहें,जब कोई कुछ सुनने वाला ही न हो।देश और समाज की हालत बद से बदतर होती जा रही है।हमने नई पीढ़ी से जो उम्मीदें बाँधी थी,एक एक कर टूट रही हैं।लोग इंसानियत और देशप्रेम छोड़कर धर्मांध और सत्तालोलुप होते जा रहे हैं।शहीदों के सपने कुचल दिये गए हैं उन्होंने अपने दर्द को कविता में भी सुनाया।और सभी को धन्यवाद दिया।कुछ कविताओं की बानगी

सोच के देखो अस्तित्व जरा बिन नारी क्या तुम पाओगे
सर पर जो आँचल न हो क्या ताप सभी सह पाओगे ?
कविता मधुर
लगी हुई है देश को मेरे,
ना जाने किस देश की नजरें।
जाति धर्म की राजनीति से,
जख्म गुलामी के फिर उभरें।।
धर्मपाल मित्रा
स्वतंत्र लेखनी है मेरी,क्यों पराधीनता स्वीकारू
सर्वत्र झूठ अन्याय दिखे तो कैसे भला मौन धारू
डा रामगोपाल भारतीय
आगे भेद बढा कर निकले
अपनी राह बना कर निकले।
भीग न जायें बारिश में हम,
अपना जिस्म बचा कर निकले
मंगल सिंह 'मंगल'

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