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पीलीभीत: 18 महीने से जमे थाना प्रभारी की कार्यप्रणाली पर सवाल, न्याय की गुहार लेकर DGP मुख्यालय पहुंचा पीड़ित


पीलीभीत/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में जीरो टॉलरेंस की नीति के दावों के बीच पीलीभीत पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर कटघरे में है। ताजा मामला सेहरामऊ उत्तरी थाने से जुड़ा है, जहाँ एक पीड़ित को स्थानीय स्तर पर न्याय न मिलने के कारण लखनऊ स्थित डीजीपी मुख्यालय की शरण लेनी पड़ी है।
क्या है पूरा मामला?
मामला पूरनपुर तहसील क्षेत्र के ग्राम मढ़ा खुर्द कलां उर्फ बिलवुक्षिया का है। यहाँ के निवासी पप्पू राठौर का आरोप है कि गांव में हुए एक विवाद के बाद उन्होंने सेहरामऊ उत्तरी थाने में लिखित तहरीर दी थी। लेकिन आरोप है कि पुलिस ने दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
पुलिस पर गंभीर आरोप
पीड़ित पप्पू राठौर ने थाना पुलिस और थाना प्रभारी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
समझौते का दबाव: आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेने के बजाय पीड़ित पर ही आरोपियों से समझौता करने का दबाव बनाया।
अभद्र व्यवहार और धमकी: पीड़ित का कहना है कि उसे थाने बुलाकर अपमानित किया गया और विरोध करने पर झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी गई।
लंबे समय से तैनाती: चर्चा का विषय यह भी है कि उक्त थाना प्रभारी पिछले 18 महीनों से एक ही थाने पर जमे हुए हैं, जिससे उनकी कार्यप्रणाली और प्रभाव पर सवाल उठ रहे हैं।
जिले से जोन तक नहीं हुई सुनवाई
न्याय की आस में पीड़ित ने पीलीभीत के पुलिस अधीक्षक (SP) से लेकर बरेली जोन के उच्चाधिकारियों के दरवाजे खटखटाए। लेकिन जब हर जगह से निराशा हाथ लगी, तो हार मानकर पीड़ित लखनऊ स्थित डीजीपी मुख्यालय पहुंच गया। वहां प्रार्थना पत्र देकर पीड़ित ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
"जब थाने से लेकर जिले तक मेरी बात नहीं सुनी गई और मुझे ही डराया-धमकाया गया, तो मेरे पास सर्वोच्च अधिकारी के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।" — पप्पू राठौर (पीड़ित)

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