"हड़ताल पर “हथौड़ा” या सिस्टम पर सवाल?"
"राजस्व व्यवस्था की सच्चाई अब सामने आनी चाहिए"
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
बिहार की राजस्व व्यवस्था लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है। आम नागरिक जब भी जमीन से जुड़े किसी काम—दाखिल-खारिज, परिमार्जन, जमीन मापी या एलपीसी—के लिए अंचल कार्यालय का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे सबसे पहले जिस चीज़ का सामना करना पड़ता है, वह है भ्रष्टाचार, देरी और दलालों का जाल।
अब जब राजस्व कर्मचारियों की हड़ताल के बीच सरकार ने यह फैसला लिया है कि अंचल के काम BDO और पंचायत सचिव करेंगे, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक कड़ा सवाल भी है।
सवाल नंबर 1: क्या अंचल कार्यालय “मोनोपॉली” का अड्डा बन चुका था?
सरकार खुद मान रही है कि अंचल कार्यालयों में एक तरह की मोनोपॉली बन गई थी।
अगर ऐसा नहीं होता तो हड़ताल के समय सरकार को इतनी बड़ी वैकल्पिक व्यवस्था करने की जरूरत क्यों पड़ती?
यह सवाल सीधे-सीधे राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता है।
सवाल नंबर 2: आम जनता को सालों से क्यों झेलनी पड़ी परेशानी?
गांव-देहात का एक गरीब किसान जब जमीन के कागज ठीक कराने जाता है तो उसे महीनों-सालों तक चक्कर काटने पड़ते हैं।
कई जगहों पर आरोप लगते रहे हैं कि बिना “गुड़” के फाइल आगे नहीं बढ़ती।
अगर अब BDO और पंचायत सचिव यह काम कर सकते हैं, तो फिर सवाल उठता है कि:
अब तक यह व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?
सवाल नंबर 3: हड़ताल की असली वजह क्या है?
राजस्व कर्मचारियों की हड़ताल सिर्फ वेतन या सेवा शर्तों का मामला नहीं बताई जा रही। कई लोग इसे अधिकार और प्रभाव क्षेत्र की लड़ाई भी मान रहे हैं।
अगर सरकार की नई व्यवस्था सफल हो जाती है, तो यह अंचल कार्यालयों की पुरानी व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।
असली परीक्षा अब शुरू
सरकार ने डिजिटल मॉड्यूल और वैकल्पिक व्यवस्था की घोषणा तो कर दी है, लेकिन असली परीक्षा अब होगी:
क्या यह व्यवस्था सच में काम करेगी?
क्या जनता को राहत मिलेगी?
या फिर यह फैसला भी कागजों तक ही सीमित रह जाएगा?
निष्कर्ष
हड़ताल पर “हथौड़ा” चलाना आसान है, लेकिन सिस्टम की जड़ में बैठी समस्याओं को खत्म करना ही असली चुनौती है।
अगर सरकार सच में पारदर्शी और जवाबदेह राजस्व प्रशासन बनाना चाहती है, तो उसे सिर्फ वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, देरी और दलाल तंत्र पर भी निर्णायक प्रहार करना होगा।
क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ एक है—
क्या बिहार की जमीन व्यवस्था सच में आम जनता के लिए आसान होगी, या फिर यह लड़ाई अभी लंबी है?