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परिवारवाद पर सियासी घमासान: युवाओं की बेरोजगारी के बीच नेताओं के बेटों को बड़े पदों पर बैठाने पर उठे सवाल

देश की राजनीति में एक बार फिर परिवारवाद को लेकर बहस तेज हो गई है। विपक्ष और आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब आम युवा पढ़-लिखकर नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं, तब राजनीतिक परिवारों से आने वाले लोगों को सीधे बड़े पदों पर क्यों बैठाया जा रहा है।

हाल ही में चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि अगर कोई गृह मंत्री का बेटा या मुख्यमंत्री का बेटा न होता, तो शायद उन्हें सामान्य नौकरी तक भी हासिल करना मुश्किल होता। लेकिन राजनीतिक परिवार से होने का फायदा यह है कि कोई क्रिकेट से ज्यादा जुड़ा न होने के बावजूद क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन बन जाता है, तो कोई ठीक से राजनीतिक अनुभव न होने के बावजूद बड़े पदों का दावेदार बन जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्षों से परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाली पार्टियां भी अब उसी रास्ते पर चलती दिखाई दे रही हैं। यही वजह है कि जनता के बीच सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह भी परिवारवाद की श्रेणी में नहीं आता।

इधर दूसरी तरफ देश के लाखों युवा कड़ी मेहनत से पढ़ाई कर रहे हैं। अच्छी डिग्री हासिल करने के बाद भी उन्हें ग्रुप-डी जैसी छोटी नौकरियों के लिए शहर-शहर भटकना पड़ रहा है। कई बार नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पर युवाओं को पुलिस की लाठियां भी झेलनी पड़ती हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि जब आम युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं, तब नेताओं के परिवार के लोगों को सीधे बड़े पदों पर बैठाने से योग्यता और समान अवसर जैसे सवाल और भी गहरे हो जाते हैं।

अब देखना यह होगा कि देश की राजनीति में परिवारवाद पर उठ रहे इन सवालों का जवाब राजनीतिक दल किस तरह देते हैं, और युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर कब तक मिल पाते हैं।

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