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एक जिद्दी लड़के की कहानी साथ ही कमेंट जरूर करें। इससे किया सिख मिला

जिद्दी लड़का
भाग–1 : एक अलग स्वभाव
एक छोटे से गांव में एक लड़का रहता था। उसका नाम आरिफ था। गांव छोटा था, लेकिन लोगों के दिल बड़े थे। चारों ओर खेत, कच्ची सड़कें और मिट्टी के घर थे। उसी गांव के किनारे एक साधारण सा घर था, जहां आरिफ अपने माता-पिता के साथ रहता था।
आरिफ बचपन से ही थोड़ा अलग था। वह ज्यादा बोलता नहीं था, लेकिन जब भी किसी बात पर अड़ जाता, तो उसे मनाना मुश्किल हो जाता था। इसी वजह से गांव के लोग उसे “जिद्दी लड़का” कहते थे।
उसके अब्बू मेहनती किसान थे। सुबह सूरज निकलने से पहले ही खेतों की ओर निकल जाते। अम्मी घर संभालती थीं और चाहती थीं कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा इंसान बने।
एक दिन अम्मी ने आरिफ से कहा,
“बेटा, पढ़ाई पर ध्यान दो। पढ़ोगे तो आगे बढ़ोगे।”
आरिफ ने शांत स्वर में कहा,
“अम्मी, मैं पढ़ूंगा… और कुछ बड़ा बनूंगा।”
अम्मी मुस्कुरा दीं, लेकिन गांव के कई लोग उसकी बात सुनकर हंसते थे।
“इससे कुछ नहीं होगा,” कुछ लोग कहते।
लेकिन आरिफ के दिल में एक सपना था।
भाग–2 : पहला ताना
स्कूल गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर था। बच्चे रोज पैदल जाते थे। रास्ते में खेत, पेड़ और एक छोटा सा तालाब पड़ता था।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने सभी बच्चों से पूछा,
“तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
किसी ने कहा डॉक्टर, किसी ने कहा पुलिस, किसी ने कहा टीचर।
जब आरिफ की बारी आई तो उसने कहा,
“मैं ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ जिसे लोग सम्मान से याद करें।”
कक्षा में कुछ बच्चे हंस पड़े।
एक लड़का बोला,
“पहले पढ़ाई तो कर ले, फिर बड़े सपने देखना।”
आरिफ चुप रहा।
उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसी दिन उसने मन में एक फैसला कर लिया।
“मैं सबको गलत साबित करूँगा।”
उसकी यही जिद आगे चलकर उसकी ताकत बनने वाली थी।
भाग–3 : कठिन दिन
समय बीतता गया। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। कई बार किताबें खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे।
एक दिन अब्बू ने कहा,
“आरिफ, अगर पढ़ाई मुश्किल लगती है तो खेत में मेरे साथ काम कर लिया करो।”
आरिफ ने तुरंत कहा,
“नहीं अब्बू, मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूंगा।”
अब्बू ने गंभीर होकर कहा,
“पढ़ाई आसान नहीं होती बेटा।”
आरिफ ने दृढ़ आवाज में कहा,
“मुझे आसान रास्ता नहीं चाहिए।”
उसकी आंखों में अजीब सी दृढ़ता थी।
भाग–4 : जिद या हिम्मत
धीरे-धीरे गांव के लोग भी उसकी मेहनत देखने लगे। वह सुबह जल्दी उठकर पढ़ता, स्कूल जाता और शाम को भी किताबों में लगा रहता।
एक दिन उसके शिक्षक ने उससे कहा,
“तुममें कुछ अलग है।”
आरिफ ने पूछा,
“क्या?”
शिक्षक बोले,
“तुम जिद्दी हो… लेकिन अगर यही जिद सही दिशा में रही, तो तुम बहुत आगे जाओगे।”
उस दिन पहली बार किसी ने उसकी जिद की तारीफ की थी।
भाग–5 : नई शुरुआत
समय धीरे-धीरे बीत रहा था। आरिफ अब पहले से ज्यादा गंभीर हो गया था। उसकी दिनचर्या बदल चुकी थी। सुबह अज़ान के समय उठना, थोड़ा समय इबादत करना, फिर पढ़ाई में लग जाना—यह उसकी आदत बन चुकी थी।
गांव के लोग अब भी उसे जिद्दी कहते थे, लेकिन अब उनके स्वर में पहले जैसा मज़ाक नहीं था।
एक दिन उसके शिक्षक ने उसे बुलाया और कहा,
“आरिफ, तुम्हारी मेहनत साफ दिख रही है। अगर तुम इसी तरह पढ़ते रहे, तो तुम गांव के सबसे अच्छे छात्रों में से एक बन सकते हो।”
आरिफ के लिए यह शब्द बहुत मायने रखते थे।
उसने विनम्रता से कहा,
“सर, मैं कोशिश कर रहा हूँ।”
शिक्षक मुस्कुराए।
“कोशिश नहीं… लगातार मेहनत करो।”
भाग–6 : पहली सफलता
कुछ महीनों बाद स्कूल की वार्षिक परीक्षा हुई। सभी छात्र परिणाम का इंतजार कर रहे थे।
जब परिणाम घोषित हुआ तो पूरे स्कूल में चर्चा शुरू हो गई।
“पहला स्थान… आरिफ!”
कुछ बच्चे आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगे। वही लड़का जिसे कभी लोग गंभीरता से नहीं लेते थे, आज पूरे स्कूल में प्रथम आया था।
शिक्षक ने उसे मंच पर बुलाया और कहा,
“यह है मेहनत का परिणाम।”
उस दिन आरिफ के अब्बू भी स्कूल आए थे। उनके चेहरे पर गर्व साफ दिखाई दे रहा था।
घर लौटते समय उन्होंने धीरे से कहा,
“मुझे तुम पर गर्व है बेटा।”
आरिफ की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।
भाग–7 : नई चुनौती
लेकिन सफलता के साथ नई चुनौतियाँ भी आती हैं।
गांव में आगे की पढ़ाई की सुविधा नहीं थी। अगर उसे आगे पढ़ना था, तो शहर जाना पड़ता।
यह बात सुनकर अम्मी चिंतित हो गईं।
“शहर में रहना आसान नहीं होता,” उन्होंने कहा।
अब्बू भी सोच में पड़ गए। घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी।
आरिफ ने शांत स्वर में कहा,
“मैं मेहनत करूंगा… और पढ़ाई भी करूंगा।”
उसकी जिद फिर सामने आ गई थी।
आखिरकार परिवार ने फैसला किया—आरिफ को शहर भेजा जाएगा।
भाग–8 : शहर की दुनिया
शहर की जिंदगी गांव से बिल्कुल अलग थी।
ऊंची इमारतें, भीड़ भरी सड़कें और तेज रफ्तार जिंदगी। शुरू-शुरू में आरिफ को बहुत अजीब लगा।
किराए के छोटे से कमरे में रहते हुए उसे खुद ही सब कुछ संभालना पड़ता था—खाना बनाना, पढ़ाई करना और कभी-कभी छोटी-मोटी नौकरी भी।
कई बार उसे बहुत थकान महसूस होती थी।
लेकिन हर बार वह खुद से कहता,
“मैं हार नहीं मानूंगा।”
उसकी वही जिद उसे आगे बढ़ा रही थी।
भाग–9 : अकेलेपन की परीक्षा
शहर में रहते हुए आरिफ को सबसे ज्यादा जिस चीज़ की कमी महसूस होती थी, वह था अपनों का साथ। गांव में हर समय कोई न कोई बात करने वाला होता था, लेकिन शहर के छोटे से कमरे में वह अक्सर बिल्कुल अकेला होता था।
कई बार रात में पढ़ते-पढ़ते उसे अम्मी की याद आ जाती।
कभी अब्बू के साथ खेतों में बिताए दिन याद आते।
एक रात उसने खुद से कहा,
“अगर मैं कमजोर पड़ गया, तो मेरा सपना भी टूट जाएगा।”
उसने अपनी किताब उठाई और फिर पढ़ाई में लग गया।
भाग–10 : मुश्किल दिन
शहर की पढ़ाई आसान नहीं थी। यहां के छात्र बहुत तेज थे। कई बार ऐसा होता कि आरिफ को कुछ समझने में बहुत समय लग जाता।
एक दिन परीक्षा में उसके नंबर उम्मीद से कम आए।
उसका मन बहुत उदास हो गया।
उसने सोचा,
“शायद लोग सही कहते थे… मैं इतना अच्छा नहीं हूँ।”
लेकिन तभी उसे अपने शिक्षक की बात याद आई—
“अगर जिद सही दिशा में हो, तो वही इंसान को आगे ले जाती है।”
उसने हार मानने के बजाय फिर से पढ़ाई शुरू कर दी।
भाग–11 : सच्चा दोस्त
उसी कॉलेज में उसकी मुलाकात एक लड़के से हुई जिसका नाम समीर था। समीर स्वभाव से बहुत अच्छा था और पढ़ाई में भी तेज था।
एक दिन उसने आरिफ से पूछा,
“तुम हमेशा इतने गंभीर क्यों रहते हो?”
आरिफ मुस्कुराया।
“क्योंकि मेरे पास समय कम है और सपना बड़ा है।”
समीर को उसकी बात बहुत पसंद आई।
धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए। अब वे साथ पढ़ते, साथ लाइब्रेरी जाते और एक-दूसरे की मदद करते।
पहली बार शहर में आरिफ को लगा कि वह अकेला नहीं है।
भाग–12 : बड़ा लक्ष्य
कॉलेज के आखिरी साल में सभी छात्र अपने भविष्य के बारे में सोच रहे थे।
एक दिन समीर ने पूछा,
“आरिफ, तुम आगे क्या करना चाहते हो?”
आरिफ कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“मैं एक बड़ा अधिकारी बनना चाहता हूँ… ताकि लोगों की मदद कर सकूं।”
समीर ने आश्चर्य से कहा,
“यह बहुत कठिन परीक्षा होती है।”
आरिफ ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा,
“कठिन रास्ते ही बड़े मुकाम तक ले जाते हैं।”
उसकी आंखों में वही पुरानी जिद चमक रही थी।
भाग–13 : बड़ी परीक्षा की तैयारी
कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद आरिफ ने अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य तय किया—एक बड़ी सरकारी परीक्षा पास करना। यह परीक्षा बहुत कठिन मानी जाती थी और हजारों छात्र हर साल इसमें बैठते थे।
आरिफ ने अपने कमरे की दीवार पर एक कागज़ चिपकाया। उस पर लिखा था:
“हार मानना मना है।”
अब उसका पूरा दिन पढ़ाई में गुजरने लगा। सुबह जल्दी उठना, अखबार पढ़ना, नोट्स बनाना और देर रात तक पढ़ाई करना—यही उसकी दिनचर्या बन गई।
कई बार थकान इतनी ज्यादा होती कि आंखें बंद होने लगतीं। लेकिन हर बार वह खुद से कहता,
“अगर अभी रुक गया, तो सपना अधूरा रह जाएगा।”
भाग–14 : पहली असफलता
कुछ महीनों की तैयारी के बाद परीक्षा का दिन आया। आरिफ ने पूरी मेहनत से परीक्षा दी।
लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था।
उसके हाथ कांपने लगे।
कुछ पल के लिए उसे लगा कि उसकी सारी मेहनत बेकार हो गई।
उस रात वह बहुत देर तक चुप बैठा रहा। उसके मन में कई सवाल थे।
“क्या मैं सच में यह कर सकता हूँ?”
लेकिन फिर उसे अपने गांव, अपने माता-पिता और अपने सपने याद आए।
उसने गहरी सांस ली और कहा,
“मैं फिर कोशिश करूंगा।”
भाग–15 : फिर से खड़ा होना
असफलता के बाद कई लोग हार मान लेते हैं, लेकिन आरिफ अलग था।
उसने अपनी गलतियों को समझना शुरू किया।
जहां कमी थी, वहां और ज्यादा मेहनत की।
अब उसकी पढ़ाई पहले से भी ज्यादा व्यवस्थित हो गई थी। वह रोज अपने लिए छोटे-छोटे लक्ष्य तय करता और उन्हें पूरा करता।
समीर ने एक दिन उससे कहा,
“तुम सच में बहुत जिद्दी हो।”
आरिफ मुस्कुराया और बोला,
“कभी-कभी जिद ही इंसान को मंजिल तक पहुंचाती है।”
भाग–16 : उम्मीद की किरण
एक साल की कड़ी मेहनत के बाद फिर से परीक्षा का समय आया।
इस बार आरिफ पहले से ज्यादा आत्मविश्वास में था।
जब परिणाम घोषित हुआ, तो उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
उसने सूची देखी…
और अचानक उसकी आंखें चमक उठीं।
उसका नाम सूची में था।
उस पल उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
उसने तुरंत अपने अब्बू को फोन किया।
फोन के उस पार से अब्बू की भावुक आवाज आई—
“मुझे पता था… मेरा बेटा जरूर सफल होगा।”
आरिफ की आंखों से खुशी के आंसू निकल आए।
भाग–17 : नई जिम्मेदारी
परीक्षा पास करने के बाद आरिफ का जीवन पूरी तरह बदल गया। अब वह एक बड़े पद के लिए प्रशिक्षण लेने जा रहा था।
जब वह अपने गांव लौटा, तो लोगों की भीड़ उसे देखने के लिए इकट्ठा हो गई। वही लोग जो कभी कहते थे—
“यह लड़का कुछ नहीं कर पाएगा।”
आज वही लोग गर्व से कह रहे थे—
“यह हमारे गांव का बेटा है।”
आरिफ ने मुस्कुराते हुए सबको सलाम किया।
भाग–18 : अम्मी की खुशी
घर पहुंचते ही अम्मी ने उसे गले लगा लिया। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
उन्होंने कहा,
“बेटा, तुम्हारी मेहनत रंग लाई।”
अब्बू ने भी गर्व से कहा,
“तुमने साबित कर दिया कि मेहनत और हिम्मत से सब कुछ संभव है।”
उस दिन घर में एक छोटा सा जश्न मनाया गया।
भाग–19 : गांव के बच्चों से मुलाकात
अगले दिन आरिफ अपने पुराने स्कूल गया।
वहीं वही कक्षाएं, वही मैदान और वही पेड़ थे। लेकिन इस बार वह एक छात्र नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बनकर आया था।
स्कूल के बच्चों ने उससे पूछा,
“सर, आप इतने बड़े कैसे बने?”
आरिफ मुस्कुराया और बोला,
“मैं बड़ा नहीं बना… मैंने सिर्फ हार नहीं मानी।”
उसकी बात सुनकर बच्चों की आंखों में चमक आ गई।
भाग–20 : एक नई सोच
आरिफ ने देखा कि गांव में अभी भी कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।
उसने तय किया कि वह गांव के लिए कुछ करेगा।
उसने अपने स्कूल में नई किताबें, लाइब्रेरी और पढ़ाई के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद की।
धीरे-धीरे गांव के बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह बढ़ने लगा।
भाग–21 : जिद का असली मतलब
एक दिन किसी ने आरिफ से पूछा,
“तुम्हारी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?”
आरिफ ने थोड़ा सोचकर जवाब दिया,
“मेरी जिद।”
फिर वह बोला,
“लेकिन जिद दो तरह की होती है—
एक जो इंसान को गलत रास्ते पर ले जाए,
और दूसरी जो उसे मंजिल तक पहुंचा दे।”
“मैंने कोशिश की कि मेरी जिद मुझे सही रास्ते पर ले जाए।”
भाग–22 : कहानी की सीख
समय बीतता गया। आरिफ अपने काम में आगे बढ़ता गया और लोगों की मदद करता रहा।
गांव के लोग अब उसे “जिद्दी लड़का” नहीं कहते थे।
अब वे कहते थे—
“वह लड़का जिसने अपनी जिद को अपनी ताकत बना लिया।”
डॉ Md FIROZ ALAM

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