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जिस प्रकार Bharatiya Janata Party और Rashtriya Swayamsevak Sangh की ओर से कभी “कांग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया गया था -

जिस प्रकार Bharatiya Janata Party और Rashtriya Swayamsevak Sangh की ओर से कभी “कांग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया गया था, आज राजनीतिक चर्चा का केंद्र अक्सर फिर वही पुराने मुद्दे बन जाते हैं। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि सरकार की अपनी नीतियों या कमियों पर चर्चा करने के बजाय बात बार-बार “70 साल”, Jawaharlal Nehru या Rahul Gandhi पर आकर रुक जाती है।
देश की जनता चाहती है कि संसद और राजनीति में मुख्य रूप से सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो। अगर हर समस्या का ठीकरा अतीत की सरकारों पर ही फोड़ा जाए, तो वर्तमान की जिम्मेदारियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कई लोगों की राय है कि “कांग्रेस मुक्त” की राजनीति करते-करते कहीं ऐसा न हो कि जनता के असली मुद्दे पीछे छूट जाएँ और राजनीतिक दल अपनी विश्वसनीयता खोने लगें। लोकतंत्र में किसी भी पार्टी की ताकत उसके काम और जनता के विश्वास से तय होती है, केवल नारों से नहीं।देश की जनता चाहती है कि संसद और राजनीति में सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे असली मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो। केवल अतीत को दोष देने से वर्तमान की जिम्मेदारियाँ खत्म नहीं हो जातीं।
लोकतंत्र में किसी भी सरकार या पार्टी की पहचान उसके काम से बनती है, न कि केवल नारों से। इसलिए आज जरूरत है कि देश के असली मुद्दों पर ध्यान दिया जाए और जनता को बेहतर शासन व सुरक्षित भविष्य दिया जाए।देश की जनता यह जानना चाहती है कि वर्तमान की समस्याओं का समाधान क्या है।
रोजगार, शिक्षा, महंगाई और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
लोकतंत्र में जनता काम देखती है, नारे नहीं।
देश को आरोप–प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व और ठोस काम से आगे बढ़ाया जा सकता है।
Dr Md Firoz Alam

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