क्या “क्रिएटिव फ्रीडम” के नाम पर समाज की सच्चाई बदली जा रही है? हिंदी फिल्मों पर उठते सवाल
— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
भारतीय सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है। फिल्मों के माध्यम से समाज की वास्तविकता, संघर्ष, भावनाएं और प्रेरणा को दिखाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन समय-समय पर यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या फिल्मों में दिखाई जाने वाली हर बात सच होती है, या फिर कभी-कभी “क्रिएटिव फ्रीडम” के नाम पर ऐसी कहानियाँ गढ़ दी जाती हैं जो समाज की वास्तविक तस्वीर से अलग होती हैं।
साल 2019 में आई अक्षय कुमार की फिल्म “मिशन मंगल” भारत के ऐतिहासिक मंगलयान मिशन पर आधारित थी। इस फिल्म को दर्शकों ने काफी पसंद किया। इसमें देशभक्ति, वैज्ञानिकों की मेहनत और भारत की वैज्ञानिक उपलब्धि को शानदार तरीके से दिखाया गया, जिससे पूरे देश को गर्व महसूस हुआ।
हालाँकि फिल्म के एक दृश्य ने कुछ लोगों के बीच बहस को जन्म दिया। फिल्म में एक मुस्लिम महिला वैज्ञानिक का किरदार दिखाया गया, जिसे किराए पर घर लेने में परेशानी होती है और लोग उसके धर्म के कारण घर देने से मना कर देते हैं। इस दृश्य को देखकर कई दर्शक भावुक हो गए और समाज में भेदभाव को लेकर चर्चा होने लगी।
लेकिन बाद में कुछ लोगों ने इस बात पर सवाल उठाया कि इसरो में काम करने वाले वैज्ञानिकों को सामान्यतः सरकारी आवास (क्वार्टर) उपलब्ध कराए जाते हैं। ऐसे में किराए के घर की समस्या दिखाने वाला दृश्य वास्तविकता से कितना मेल खाता है — यह एक चर्चा का विषय बन गया।
इसके अलावा कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि फिल्म में दिखाया गया यह किरदार वास्तविक मंगलयान मिशन की टीम का हिस्सा नहीं था, बल्कि फिल्म की कहानी को प्रभावी बनाने के लिए एक काल्पनिक पात्र के रूप में जोड़ा गया था। फिल्म निर्माताओं ने इसे “क्रिएटिव फ्रीडम” का हिस्सा बताया।
यही वह बिंदु है जहाँ से बहस शुरू होती है। कई लोग मानते हैं कि फिल्मों को समाज की सच्चाई दिखानी चाहिए, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि फिल्मों में कहानी को प्रभावी बनाने के लिए काल्पनिक पात्र और घटनाएँ जोड़ना सामान्य बात है।
लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब फिल्में वास्तविक घटनाओं पर आधारित हों, तो क्या उनमें दिखाए गए काल्पनिक प्रसंग दर्शकों की सोच और समाज की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं?
आज के दौर में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह समाज की सोच और विचारधारा को भी प्रभावित करता है। इसलिए दर्शकों के लिए भी जरूरी है कि वे फिल्मों को देखते समय मनोरंजन और वास्तविकता के बीच अंतर को समझें।
सिनेमा शक्तिशाली माध्यम है। अगर इसका उपयोग सकारात्मक प्रेरणा और सत्य के साथ किया जाए तो यह समाज को आगे बढ़ाने का काम करता है। लेकिन यदि तथ्यों और कल्पना के बीच की सीमा धुंधली हो जाए, तो यही सिनेमा बहस और विवाद का कारण भी बन सकता है।
यही कारण है कि आज समाज में यह चर्चा लगातार तेज हो रही है —
क्या फिल्मों को पूरी तरह मनोरंजन मानकर देखा जाए, या फिर जब वे वास्तविक घटनाओं पर आधारित हों तो उनसे तथ्यों की जिम्मेदारी भी अपेक्षित होनी चाहिए?
शायद यही सवाल आज के सिनेमा के सामने सबसे बड़ा आईना बनकर खड़ा है।