शाहपुर पटोरी: रफ़्तार का शोर, सरकारी चुप्पी और सिसकती संवेदनाएं
"क्या हम किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहे हैं?"
आज सुबह शाहपुर पटोरी की सड़कों पर जो हुआ, उसने एक बार फिर हमारे रोंगटे खड़े कर दिए। एक मासूम बच्चा काल के गाल में समाते-समाते बचा। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन और समाज तभी जागेंगे जब किसी घर का चिराग बुझ जाएगा?
पटोरी के अनुमंडल मुख्यालय और थाने के सामने से गुजरते ये ट्रैक्टर महज वाहन नहीं, बल्कि कानून के माखौल का प्रतीक बन चुके हैं। अवैध बालू और मिट्टी का खनन कर, ओवरलोडेड ट्रॉलियों पर ऊंचे स्वर में बजते भोजपुरी फूहड़ गाने न केवल ध्वनि प्रदूषण फैला रहे हैं, बल्कि राहगीरों के मानसिक संतुलन और सुरक्षा को भी चुनौती दे रहे हैं।
विडंबना देखिए, यह तमाशा उस सड़क पर होता है जहां अस्पताल है और कोचिंग संस्थान हैं। बीमार मरीज को सुकून चाहिए और छात्र को एकाग्रता, लेकिन उन्हें मिलता है कर्कश संगीत और जानलेवा रफ़्तार। बिहार सरकार के स्पष्ट आदेश हैं कि बिना अनुमति डीजे नहीं बजेगा, फिर पटोरी की सड़कों पर यह "कानून का उल्लंघन" सरेआम कैसे हो रहा है?
जब गाड़ियां थाने और (अनुमंडल मुख्यालय) जगदम्बा स्थान जैसे प्रमुख केंद्रों से गुजरती हैं, तो क्या अधिकारियों के कान उन अश्लील गानों और तेज आवाज को नहीं सुन पाते? क्या प्रशासन को अब भी "पब्लिक पेटिशन" का इंतजार है?
सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का मौलिक कर्तव्य है, कोई ऐच्छिक कार्य नहीं।
"सड़कें आवागमन के लिए होती हैं, शमशान का रास्ता बनाने के लिए नहीं। आज जो बच्चा बच गया, वह हमारी जागरूकता के कारण नहीं, बल्कि उसकी किस्मत की वजह से बचा है।"
अब जागने का वक्त है
यह लेख केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि शाहपुर पटोरी के जागरूक नागरिकों की हुंकार है। हम सरकार और स्थानीय प्रशासन से मांग करते हैं कि:
अवैध खनन और ओवरलोडिंग पर तत्काल रोक लगे।
सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील और तेज डीजे बजाने वालों के ट्रैक्टर जब्त किए जाएं।
स्कूल और अस्पताल क्षेत्रों को 'नो टॉलरेंस ज़ोन' घोषित किया जाए।
"समय रहते चेत जाइए, वरना इतिहास गवाह है कि जनता का सब्र जब टूटता है, तो सिंहासन डोलने लगते हैं।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT