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जब सत्ता को लगने लगे कि “सवर्णों के पास विकल्प नहीं”, तब लोकतंत्र खतरे में होता है

— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि हर नागरिक और हर समाज के पास चुनने का अधिकार और विकल्प होता है। लेकिन अगर सत्ता के गलियारों में यह सोच बैठ जाए कि कोई एक समाज कहीं नहीं जाएगा और उसके पास कोई विकल्प नहीं है, तो यह केवल राजनीतिक अहंकार नहीं बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना का अपमान भी है।
हाल ही में मीडिया में आई खबरों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं की ओर से यह कथन सामने आया कि “सवर्णों के पास कोई विकल्प नहीं है।”
यह कथन केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस मानसिकता की झलक है जिसमें किसी पूरे समाज को मजबूर वोट बैंक मान लिया जाता है।
वोट बैंक की राजनीति और समाज का स्वाभिमान
पिछले कई वर्षों से देश के सवर्ण मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ खड़ा रहा है। लेकिन जब किसी समाज के बारे में यह मान लिया जाए कि वह चाहे कुछ भी हो जाए, कहीं नहीं जाएगा — तो यह स्थिति केवल राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि स्वाभिमान पर चोट भी बन जाती है।
क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी समाज किसी राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति या जागीर नहीं होता।
2018 का आंदोलन याद है?
राजनीतिक विश्लेषक याद दिलाते हैं कि 2018 में SC/ST एक्ट में संशोधन को लेकर देशभर में सवर्ण समाज के बीच भारी आक्रोश देखने को मिला था।
उस समय भी कई लोगों ने यही कहा था कि चाहे जितना विरोध हो, सवर्ण मतदाता आखिर जाएंगे कहां।
आज शिक्षा व्यवस्था और नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों, खासकर University Grants Commission (UGC) से जुड़े विवादों में भी वही मानसिकता दिखाई दे रही है — मानो सवर्ण समाज की आवाज़ का कोई महत्व ही नहीं है।
लोकतंत्र में कोई स्थायी वोट बैंक नहीं होता
इतिहास गवाह है कि जब किसी समाज को यह महसूस होने लगता है कि उसकी चिंताओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, तो वह अपने राजनीतिक निर्णयों पर पुनर्विचार भी करता है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सम्मान और न्याय के बिना समर्थन स्थायी नहीं रहता।
संदेश साफ है
आज देश के कई मंचों पर एक संदेश तेजी से उभर रहा है —
कोई भी समाज किसी पार्टी की जागीर नहीं होता। सम्मान मिलेगा तो समर्थन मिलेगा,
अन्यथा निर्णय भी बदल सकता है। और शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई है।
स्वाभिमान पहले, राजनीति बाद में।

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