तुलसीदास को गाली देने वालों, कभी कबीरदास को भी पढ़ लिया करो
— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
आजकल एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। कुछ लोग बिना पूरा साहित्य पढ़े और बिना संदर्भ समझे संत कवि गोस्वामी तुलसीदास पर आरोप लगाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर उनके एक-दो दोहों को लेकर ऐसी बहस छेड़ दी जाती है मानो उन्होंने समाज के साथ कोई बड़ा अन्याय कर दिया हो।
लेकिन सवाल यह है कि जो लोग तुलसीदास जी पर इतना आक्रोश दिखाते हैं, क्या उन्होंने कभी संत कबीर दास के दोहों को भी उसी दृष्टि से पढ़ा है?
संत कबीर ने भी अपने कई दोहों में “कनक और कामिनी” यानी धन और स्त्री के मोह को मनुष्य के पतन का कारण बताया है। कई स्थानों पर उन्होंने स्त्री के विषय में अत्यंत कठोर प्रतीकों और शब्दों का प्रयोग किया है, ताकि मनुष्य को विषय-वासना से दूर रहने की चेतावनी दी जा सके।
फिर कबीर पर बहस क्यों नहीं?यदि किसी संत की पंक्तियों को आज के समय के चश्मे से देखकर विवाद खड़ा करना ही उद्देश्य है, तो फिर यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि ऐसी बहस केवल तुलसीदास जी पर ही क्यों होती है? क्यों नहीं वही लोग कबीरदास के दोहों पर भी उतनी ही तीखी चर्चा करते? क्या कारण है कि कुछ लोग केवल उन्हीं संतों और ग्रंथों को निशाना बनाते हैं जो सनातन परंपरा से जुड़े हैं?
संतों की भाषा का असली अर्थ
संतों की भाषा प्रतीकात्मक होती थी। “कनक” का अर्थ धन का मोह और “कामिनी” का अर्थ विषय-वासना से जुड़ा आकर्षण माना जाता था।
उनका उद्देश्य किसी महिला का अपमान करना नहीं था, बल्कि मनुष्य को यह समझाना था कि अत्यधिक लोभ, मोह और वासना से समाज और व्यक्ति दोनों का पतन होता है।
आधा ज्ञान, पूरा विवाद
आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पूरी किताब पढ़ने के बजाय आधी पंक्ति पढ़कर निर्णय सुना देते हैं।
संतों के हजारों पद, दोहे और ग्रंथों में से एक पंक्ति निकालकर पूरे संत को कठघरे में खड़ा कर देना न तो बौद्धिक ईमानदारी है और न ही समाज के लिए उपयोगी।
सच यह है…सच तो यह है कि न तुलसीदास गलत थे और न ही कबीरदास। दोनों महान संतों ने अपने समय के समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया था। उन्होंने मनुष्य को मर्यादा, संयम और नैतिक जीवन की शिक्षा दी थी ताकि समाज में अनुशासन बना रहे। लेकिन आज के समय में समस्या यह है कि लोग संतों के संदेश को समझने के बजाय उन्हें विवाद का विषय बना देते हैं।
समाज के लिए संदेश --अगर वास्तव में संतों के साहित्य को समझना है, तो हमें उनके शब्दों से पहले उनके भाव और उद्देश्य को समझना होगा। क्योंकि संतों का काम समाज को तोड़ना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाना था। और शायद यही कारण है कि आज भी उनके शब्द लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं।