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क्या सवर्ण समाज सरकारी व्यवस्था में नया ‘अछूत’ बनता जा रहा है?


— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
हाल ही में Odisha Public Service Commission द्वारा जारी एक भर्ती विज्ञापन ने देश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। आयोग ने डेंटल सर्जन (Group-A) के 124 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया है, लेकिन पदों का आरक्षण वितरण देखने के बाद सामान्य वर्ग के युवाओं में तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है।
विज्ञापन के अनुसार कुल 124 पदों में से केवल 10 पद अनारक्षित (UR) रखे गए हैं। वहीं 84 पद अनुसूचित जनजाति (ST), 22 पद अनुसूचित जाति (SC) और 8 पद SEBC वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं।
यह आंकड़ा कई युवाओं के लिए चौंकाने वाला है। सवाल उठ रहा है कि जब अनारक्षित श्रेणी ही सामान्य वर्ग के लिए एकमात्र अवसर है, तो 124 में से केवल 10 सीट क्या न्यायपूर्ण अवसर का संकेत देती है?
“योग्यता बनाम राजनीति” की बहस
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय के उद्देश्य से लागू की गई थी, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बनती चली गई। कई युवाओं का आरोप है कि सरकारें वोट बैंक की राजनीति के दबाव में आरक्षण का दायरा बढ़ाती रही हैं, जबकि सामान्य वर्ग के युवाओं के अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं।
आज स्थिति यह बनती दिखाई दे रही है कि योग्यता और प्रतिस्पर्धा की जगह श्रेणी आधारित अवसरों का अनुपात अधिक प्रभावी हो गया है।
सवर्ण युवाओं में बढ़ती निराशा
देश के कई हिस्सों में सामान्य वर्ग के युवा यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि आरक्षण का प्रतिशत लगातार बढ़ता रहेगा, तो आने वाले समय में उनके लिए सरकारी सेवाओं में अवसर कितने रह जाएंगे।
कई युवा संगठनों का कहना है कि यह स्थिति एक नए प्रकार की सामाजिक विडंबना को जन्म दे रही है, जहां एक वर्ग जो कभी सामाजिक रूप से मजबूत माना जाता था, वही आज अवसरों के मामले में स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
सरकार के सामने बड़ा प्रश्न
यह मुद्दा केवल एक भर्ती विज्ञापन का नहीं है, बल्कि उस व्यापक नीति का है जिस पर देश की नौकरियों और अवसरों की संरचना खड़ी है।
सवाल यह है कि क्या सरकार सामाजिक न्याय और समान अवसर के बीच संतुलन बनाने के लिए कोई नई सोच विकसित करेगी?
या फिर आने वाले समय में भी इसी तरह की भर्तियां देश के लाखों युवाओं के बीच असंतोष और बहस को जन्म देती रहेंगी?

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