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पटना से पंचायत तक : फाइलों में दौड़ता विकास और हकीकत की बदहाली ।

"लकड़ी के कीड़े पूरे कुर्सी खा जाते हैं,
और कुर्सी के कीड़े पूरे देश"

बिहार की वह पावन मिट्टी, जिसने वैशाली के रूप में विश्व को लोकतंत्र का पहला पाठ पढ़ाया, आज उसी लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई—हमारी ग्राम पंचायतें और नगर निकाय—भ्रष्टाचार के दलदल में सिसक रही हैं।

सरकार हर साल अरबों का फंड "योजना मद" में जारी करती है ताकि गाँव की पगडंडी सड़क बन सके, अंधेरी गलियों में रोशनी पहुँचे और जलभराव से मुक्ति मिले। लेकिन अफसोस! ये की योजनाएं जनता की दहलीज तक पहुँचने से पहले ही सिस्टम के "सफेदपोश गिद्धों" और "बिचौलियों" के लालच की भेंट चढ़ जाती हैं।

इतिहास के पन्नों को पलटें, तो याद आता है कि जब गोरे अंग्रेजों ने देश को लूटा था, तब हमारे क्रांतिकारियों ने अपने खून की होली खेलकर उन्हें खदेड़ा था। उन शहीदों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन आज़ाद भारत में 'अपने ही अपनों का खून चूसेंगे'।

आज त्रासदी यह नहीं कि हम पर कोई बाहरी हमला कर रहा है; त्रासदी यह है कि भ्रष्टाचार का यह घुन घर के भीतर ही लगा है। उस वक्त दुश्मन पहचाना जाता था, आज दुश्मन "कुर्सी" और "सिस्टम" के पीछे छिपा है। अब सवाल यह है कि अपनों के खिलाफ इस जंग को कहाँ ले जाएँ?

सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralization) इसलिए हुआ था कि गाँव का गरीब भी मालिक बने। मगर आज हकीकत इसके उलट है। किसी नगर निगम या पंचायत में क्या योजना आ रही है और कितना बजट है, इसे किसी "तिजोरी के राज" की तरह छिपाकर रखा जाता है। पारदर्शिता के इसी अभाव का फायदा भ्रष्ट अधिकारियों (E.O.), मेयर और मुखियाओं का वह अघोषित "गठबंधन" उठाता है, जो जनता के खून-पसीने के पैसे को अपनी निजी जागीर समझ बैठा है।

उस आम आदमी की कल्पना कीजिए, जो चिलचिलाती धूप में दो वक्त की रोटी के लिए अपना वजूद गला देता है। उसके द्वारा दिए गए टैक्स के एक-एक पैसे से बिहार के भविष्य की पटकथा लिखी जानी चाहिए थी। मगर यहाँ "टेंडर और कमीशन" का ऐसा नंगा नाच चल रहा है, जहाँ ठेकेदारी काम पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि लूट के बँटवारे के लिए की जाती है। बिचौलियों का एक नया रसूखदार वर्ग खड़ा हो गया है, जिसकी चमक आम आदमी की बदहाली और उसकी आँखों के सूखे आंसुओं पर टिकी है।

जब कोई जागरूक नागरिक सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए इस तंत्र की परतों को उधेड़ने की कोशिश करता है, तो उसके सामने दो ही रास्ते छोड़े जाते हैं: या तो उसके ईमान की बोली लगा दी जाती है
या फिर अडिग रहने पर उसे डराया जाता है, और कई बार उसकी आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाता है।

"यह लोकतंत्र की पराकाष्ठा है कि जहाँ जनता को 'सरकार' होना चाहिए था, वहाँ वह अपने ही हक का हिसाब माँगने के लिए अपनी जान की बाजी लगा रही है।"

योजनाओं की समीक्षा (Review) महज एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई है। फाइलों में नालियां बन जाती हैं, सड़कें चकाचक हो जाती हैं, लेकिन पहली मानसूनी बारिश इन 'झूठे दावों' को बहा ले जाती है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि बिहार के आने वाले भविष्य के साथ किया जा रहा एक जघन्य अपराध है।

बिहार का यह दुर्भाग्य तब तक नहीं बदलेगा जब तक हम अपनी 'सहिष्णुता' को तोड़कर सवाल नहीं करेंगे। वार्ड सभाओं और ग्राम सभाओं में हमारी चुप्पी ही इन भ्रष्टाचारियों की सबसे बड़ी ताकत है। तकनीक (E-Governance) का सहारा लें और सामूहिक आवाज़ बुलंद करें।

हमें यह याद रखना होगा कि जो पैसा लूटा जा रहा है, वह किसी नेता की जेब का नहीं, बल्कि हमारे बच्चों की शिक्षा और उनके बेहतर कल का है। यदि आज हम नहीं बोले, तो आने वाली नस्लें हमसे सवाल करेंगी।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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