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इच्छामृत्यु “मां की सबसे दर्दनाक दुआ” कानूनी प्रक्रिया, डॉक्टरों की राय और परिवार की सहमति बहुत महत्वपूर्ण होती है।

कहते हैं कि दुनिया में मां अपने बच्चे की लंबी उम्र के लिए दुआ करती है। लेकिन कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर आ जाती है, जब मां को अपने ही बेटे के लिए मौत की दुआ मांगनी पड़ती है।
यह कहानी है हरीश राणा की, जो उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले थे। हरीश एक सामान्य और सपनों से भरी जिंदगी जी रहे थे। लेकिन साल 2013 में एक हादसे ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी।
एक दुर्घटना में उन्हें इतनी गंभीर ब्रेन इंजरी हुई कि वे कोमा जैसी हालत में चले गए। डॉक्टरों ने बताया कि हरीश परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं — यानी उनका शरीर तो जिंदा है, लेकिन उन्हें होश नहीं है और ठीक होने की संभावना भी लगभग नहीं है।
दिन महीनों में बदले, महीने सालों में बदल गए। लेकिन हरीश की हालत वैसी ही रही। पूरे 13 साल तक वे बिस्तर पर पड़े रहे, न बोल सके, न चल सके, न अपनी जरूरतें बता सके। उनका पूरा जीवन मशीनों और दूसरों की मदद पर निर्भर हो गया।
सबसे ज्यादा दर्द उनके माता-पिता को था। एक मां रोज अपने बेटे को इस हालत में तड़पते देखती रही। आखिरकार जब उम्मीद लगभग खत्म हो गई, तो उस मां ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
उसने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि उसके बेटे को इस असहनीय जीवन से मुक्ति दी जाए। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि यह सिर्फ कानून नहीं बल्कि इंसानियत और भावनाओं से जुड़ा सवाल भी था।
लंबी सुनवाई और मेडिकल रिपोर्ट्स देखने के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने हरीश राणा के मामले में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी, ताकि उन्हें गरिमा के साथ मृत्यु मिल सके।
यह फैसला सिर्फ एक परिवार के दर्द की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के फैसले कितने कठिन और संवेदनशील होते हैं।
Awareness
गंभीर बीमारियों और दुर्घटनाओं से बचने के लिए सुरक्षा और समय पर इलाज बेहद जरूरी है।
इच्छामृत्यु जैसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया, डॉक्टरों की राय और परिवार की सहमति बहुत महत्वपूर्ण होती है।
हमें ऐसे परिवारों के दर्द को समझना चाहिए और मानव गरिमा (Right to Die with Dignity) के विषय पर संवेदनशील रहना चाहिए।

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