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आर्थिक आधार और संवैधानिक चेतना सुदृढ़ लोकतंत्र की नई दिशा- कृष्ण कुमार पाठक लेखक/पत्रकार

भारतीय लोकतंत्र का मूल मंत्र "जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन।"लेकिन इस आदर्श को धरातल पर उतरने के लिए केवल शासन की संरचना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनमानस में संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता और व्यवस्था की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।
आज के परिवेश में जब हम लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचार और सुदृढ़ बनाने की बात करते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की आती है।
जाति से परे: आर्थिक आधार पर वर्गीकरण की आवश्यकता-
वर्तमान समय में आरक्षण और जातिगत आधार पर मिलने वाली सुविधाओं ने समाज में एक विशेष प्रकार का असमंजस पैदा किया है। लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब की मुख्य धारा में अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति शामिल हो। इसके लिए अब समय आ गया है कि हम जातिगत पहचान से ऊपर उठकर आर्थिक आधार पर समाज के श्रेणीकरण पर विचार करें।
गरीबी रेखा का पुननिर्धारण-यदि न्यूनतम ₹10000 मासिक आय वाले परिवार को गरीबी वर्ग में श्रेणीकृत किया जाए तो लक्षित सहायता अधिक प्रभावित होगी।
प्रतिभा का सम्मान-शैक्षणिक संस्थानों में चयन का आधार जातिगत के बजाय बौद्धिक क्षमता और शैक्षणिक योग्यता होनी चाहिए। जब प्रतिभा को उचित स्थान मिलता है, तब राष्ट्र की बौद्धिक संपदा में वृद्धि होती है।
मौलिक अधिकारों में समन्वय-
यूजीसी(UGC) के नियमों और अन्य संवैधानिक प्रावधानों में इस प्रकार के बदलाव की आवश्यकता है जो मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बना सके।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार-सर्वांगीण विकास के स्तंभ लोकतंत्र का मूल आधार लोक कल्याण है। आर्थिक आधार पर श्रेणीकरण न केवल गरीबी और अमीरों के बीच खाई कम करेगा, बल्कि इससे सामाजिक सद्भावना भी बढ़ेगी।
विधायिका को चाहिए कि नीतिगत निर्णय लेते समय निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे!
सामान्य शिक्षा और स्वास्थ्य-
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करना।
रोजगार सृजन-
कौशल विकास और बौद्धिक योग्यता के आधार पर युवाओं को अवसर प्रदान करना।
कृषि क्षेत्र में सुधार भारत की आत्मा गांवों में बसती है। अतः कृषि विकास के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना।
राष्ट्रीय एकीकरण और सांस्कृतिक संरक्षण-
जब जनमानस को विश्वास हो जाता है की व्यवस्था निष्पक्ष है और उनकी योग्यता का सम्मान हो रहा है, तब शासन के प्रति उनके आस्था और विश्वास प्रगाढ़ होता है।
आर्थिक न्याय के माध्यम से किया गया सुधार स्वाभाविक रूप से सामाजिक समन्वय और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है। यह न केवल हमारे सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करेगा बल्कि देश को विकास की एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा।
निष्कासित संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण और जनमानस में इसके प्रति जागरूकता की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली शक्ति है।
जातिगत बंधनों से मुक्त होकर आर्थिक न्याय की ओर बढ़ना ही यह सशक्त और समृद्ध भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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