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मानवता, संत परंपरा और आज की राजनीति का सच । (समानता, भाईचारे और राष्ट्रीय चेतना पर एक विचार)

मानव इतिहास के लंबे कालखंड को देखें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि समाज में अधिकांश संघर्ष धन, सत्ता, भूमि, प्रतिष्ठा और अहंकार के कारण हुए हैं। अक्सर कहा जाता है कि दुनिया में लड़ाइयों की जड़ “जर, जोरू और जमीन” रही है। इसके साथ-साथ धर्म, जाति और भाषा को भी कई बार ऐसे रूप में इस्तेमाल किया गया, जिससे समाज में नफरत और विभाजन पैदा हुआ।

भारत जैसे महान और विविधतापूर्ण देश में यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि सदियों से चली आ रही जातिगत भेदभाव और संकीर्ण मानसिकता ने समाज को कई हिस्सों में बांट दिया। तथाकथित “छोटी जातियों” के साथ लंबे समय तक सामाजिक अन्याय हुआ—उन्हें शिक्षा, सम्मान और धार्मिक अधिकारों से वंचित रखा गया।

लेकिन इस अंधकार के बीच भारत की भूमि ने ऐसे संत, फकीर और गुरुओं को जन्म दिया जिन्होंने मानवता का दीपक जलाया और समाज को प्रेम, समानता और भाईचारे का मार्ग दिखाया।

गुरु नानक देव जी का मानव धर्म

Guru Nanak

गुरु नानक देव जी ने उस समय समाज में फैले कर्मकांड, अंधविश्वास और जातिगत अहंकार का खुलकर विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईश्वर एक है और सभी मनुष्य उसकी संतान हैं।

उन्होंने सिखाया कि धर्म केवल पूजा-पाठ और बाहरी आडंबर का नाम नहीं है, बल्कि सच्चा धर्म ईमानदार जीवन, सेवा और मानव प्रेम में है।

उनकी शिक्षा—

नाम जपो

किरत करो

वंड छको

मानव समाज को समानता और सहयोग का मार्ग दिखाती है। लंगर की परंपरा इस बात का प्रतीक है कि सभी मनुष्य एक साथ बैठकर भोजन करें—कोई ऊँच-नीच नहीं।

संत रविदास जी का बेगमपुरा

Ravidas

संत रविदास जी ने अपने जीवन और वाणी से यह संदेश दिया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसके कर्म और भक्ति से होती है।

उन्होंने एक ऐसे समाज का सपना देखा जिसे उन्होंने “बेगमपुरा” कहा—जहाँ कोई भेदभाव नहीं, कोई अन्याय नहीं, और सभी मनुष्य समान अधिकारों के साथ जीवन जी सकें।

संत नामदेव जी का संदेश

Namdev

संत नामदेव जी ने भी भक्ति के माध्यम से यह बताया कि ईश्वर मंदिरों और मस्जिदों की सीमाओं में कैद नहीं है। वह हर मनुष्य के हृदय में बसता है।

उनकी वाणी समाज को यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें मानव प्रेम और सत्य जीवन हो।

मुस्लिम सूफी संतों का प्रेम का संदेश

भारत की भूमि पर मुस्लिम सूफी संतों ने भी प्रेम, भाईचारे और इंसानियत की अनमोल शिक्षा दी।

शेख फरीद

Fariduddin Ganjshakar

शेख फरीद की वाणी में विनम्रता, प्रेम और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने सिखाया कि मनुष्य को घमंड छोड़कर विनम्रता और सेवा का मार्ग अपनाना चाहिए। उनकी बाणी आज भी Guru Granth Sahib में शामिल है।

बुल्ले शाह

Bulleh Shah

बुल्ले शाह ने धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे पाखंड और विभाजन का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है।
उनकी कविताएँ यह संदेश देती हैं कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को समाप्त नहीं करता, तब तक वह ईश्वर तक नहीं पहुँच सकता।

कबीर दास

Kabir

कबीर दास ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों में फैले कर्मकांड और संकीर्ण सोच की आलोचना की।

उनका प्रसिद्ध संदेश था:
“मस्जिद चढ़ि कर मौलवी, क्या बहरा हुआ खुदाय
जो तू भीतर जागता, बाहर क्यों चिल्लाय।”

कबीर ने कहा कि ईश्वर मंदिर और मस्जिद से पहले मनुष्य के हृदय में बसता है।

राजनीति और समाज की विडंबना

इतिहास के इन महान संतों ने समाज को जोड़ने का प्रयास किया, लेकिन दुर्भाग्य से कई बार राजनीति ने समाज को जोड़ने के बजाय विभाजन की राह अपनाई।

युगों से चली आ रही संकीर्ण और ओछी राजनीति ने कई बार धर्म, जाति और भाषा के नाम पर लोगों को बांटा। इससे समाज में आपसी सहयोग और विश्वास का विकास कमजोर पड़ता रहा।

आज भी देश की संसद में कई बार बहस राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती है। लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि संसद देश के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा का मंच बने।

कई बार राजनीतिक विमर्श अतीत की बहसों में उलझ जाता है—कौन क्या कर गया और किसने क्या नहीं किया। लेकिन देश के नागरिक के रूप में लोगों की अपेक्षा यह भी रहती है कि वर्तमान सरकारें अपनी उपलब्धियों, योजनाओं और विकास कार्यों को स्पष्ट रूप से सामने रखें और भविष्य की दिशा बताएं।

लोकतंत्र में नागरिक की जिम्मेदारी

लोकतंत्र केवल सरकार या विपक्ष का नहीं होता—यह पूरे देश के नागरिकों का होता है।

हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह

अपने विचार और भावनाएँ व्यक्त करे

सरकार से प्रश्न पूछे

समाज में भाईचारा और सद्भाव की बात करे

यह लोकतंत्र की शक्ति है, कमजोरी नहीं।

निष्कर्ष

भारत की महान संत परंपरा—गुरु नानक देव जी, संत रविदास जी, संत नामदेव जी, शेख फरीद, बुल्ले शाह और कबीर—सभी ने एक ही संदेश दिया:

मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसकी मानवता है।

यदि हम इन संतों की शिक्षाओं को अपने जीवन और समाज में अपनाएँ, तो धर्म, जाति और भाषा के नाम पर होने वाले संघर्ष कम हो सकते हैं और समाज फिर से प्रेम और भाईचारे के मार्ग पर चल सकता है।

लेखक:
देश चिंतक
डॉ. मोहिंदर सिंह बाली

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