रूसी तेल पर पहले दिखाई अकड़, अब होर्मुज पर गर्दन फंसी तो भारत-भारत चिल्लाने लगी दुनिया
याद कीजिए वह दौर, जब अमेरिका भारत को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा था. रूसी तेल खरीदने पर आंखें दिखा रहा था. डोनाल्ड ट्रंप ने तो 50 फीसदी टैरिफ सिर्फ इसी बात के लिए लगा दिया था कि भारत उनके दबाव में नहीं आ रहा था.
ट्रंप चाहते थे कि भारत रूस से एक बूंद भी तेल न खरीदे. लेकिन आज जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर इनकी गर्दन फंस गई, तो सारी अकड़ हवा हो गई. आज वही अमेरिका, वही इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) भारत के सामने हाथ जोड़े खड़ी है और कह रही है कि भारत को रूस से तेल खरीदना चाहिए, ताकि ऑयल मार्केट को महंगाई की आग में जलने से बचाया जा सके.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के कार्यकारी निदेशक फतह बिरोल अब भारत की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं. बिरोल को यह देखकर बहुत खुशी हो रही है कि भारत सरकार इमरजेंसी ऑयल स्टॉक जारी करने की IEA की सामूहिक कार्रवाई का समर्थन कर रही है और वैश्विक बाजार की स्थिरता को बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाने को तैयार है.
अमेरिका की बेबसी का सार्वजनिक कबूलनामा
भारत को रोज धमकाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट कह रहे कि हमने 30 दिन की छूट दी है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बनी रहे. अंदाज अहसान जताने वाला है लेकिन असल में अमेरिका की अपनी बेबसी का सार्वजनिक कबूलनामा है. जिस वॉशिंगटन ने एक साल तक अपनी पूरी ताकत इस बात पर लगा दी कि रूस का खजाना खाली हो जाए, आज वही वॉशिंगटन कह रहा है कि भारत रूस को पैसे दे ताकि अमेरिका में पेट्रोल के दाम न बढ़ें. बात यहीं खत्म नहीं होती, ट्रंप ने तो यहां तक संकेत दे दिया है कि वे रूस की अन्य तेल आपूर्तियों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं.
भारत ने 50 फीसदी बढ़ा दी रूस से खरीद
भारत पीछे नहीं है… ना तो उसने ट्रंप के कहने पर रूस से तेल लेना छोड़ा है, ना छोड़ने को तैयार है. और तो और भारत ने तेल की खरीद 50 फीसदी बढ़ा दी है. जहाज निगरानी के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि फरवरी में जहां भारत रूस से रोज करीब 10.4 लाख बैरल तेल खरीद रहा था, वहीं मार्च में यह बढ़कर रोजाना 15 लाख बैरल पहुंच गया है. यानी सीधे डेढ़ गुना हो गया है.
जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री की बात
इसी बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव के साथ एक लंबी बातचीत की है. आधिकारिक बयानों में भले ही यह कहा जा रहा हो कि यह चर्चा मुख्य रूप से ईरान की स्थिति पर केंद्रित थी, लेकिन कूटनीति की समझ रखने वाला कोई भी नौसिखिया बता सकता है कि इस बातचीत का मुख्य एजेंडा क्या था. विशेषज्ञों का साफ मानना है कि इस दौरान रूसी तेल की खरीद और आपूर्ति को लेकर ही असली रणनीति बुनी गई है.
डेटा एनालिटिक्स फर्म 'केप्लर' के आंकड़े बताते हैं कि इस समय समुद्र में लगभग 13 करोड़ बैरल रूसी तेल तैर रहा है. होर्मुज में लगे जाम और पश्चिमी देशों की नई सहमति के बाद, इस बात की पूरी संभावना है कि इनमें से अधिकांश बैरल बहुत तेज से भारतीय बंदरगाहों की ओर मोड़ दिए जाएंगे. केप्लर के विश्लेषकों का भी यही अनुमान है कि भारत बहुत जल्द प्रतिबंधों से पहले वाली स्थिति में लौट आएगा और अपनी जरूरत का 40-45 प्रतिशत कच्चा तेल वापस रूस से ही खरीदने लगेगा.