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"शांति कुमारी का 19 साल का 'बनवास' और सिस्टम की निर्दयता"

संपादकीय:
"शांति कुमारी का 19 साल का 'बनवास' और सिस्टम की निर्दयता"

लेखक: विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के नारों के बीच गया की एक शिक्षिका की चुप्पी हमें लगातार कचोटती है। जब हम 'नारी शक्ति' और 'नारी से नारायणी' का जयघोष करते हैं, तो दो तस्वीरें सामने आती हैं। एक तरफ विज्ञान भवन और सुप्रीम कोर्ट की चमकदार दुनिया है, जहाँ राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा विजया रहाटकर संस्कारों की बात करती हैं और उच्चतम न्यायालय 'आधी आबादी' को न्यायपालिका में आधी हिस्सेदारी देने का विमर्श करता है।

लेकिन असली तस्वीर बिहार के गया जिले के शेरघाटी की है। प्राथमिक विद्यालय अफजलपुर में कार्यरत सहायक शिक्षिका शांति कुमारी लगभग 19 वर्षों (2006 से अब तक) से अपने बकाया वेतन और न्याय के लिए सिस्टम की चौखट पर माथा टेक रही हैं। क्या दिल्ली की संवैधानिक आवाज़ इस शिक्षिका के घर की चुप्पी तोड़ पाएगी?

शेरघाटी में हाल ही 'वन स्टॉप सेंटर' का उद्घाटन और सात महिला मुखियाओं का सम्मान प्रशासन की 'कवच' परियोजना की संवेदनशीलता दिखाता है। लेकिन असली 'कवच' तब बनेगा, जब व्यवस्था शांति कुमारी जैसी महिलाओं को उनकी मेहनत की कमाई और सम्मान लौटाएगी।

19 साल का इंतज़ार किसी लोकतांत्रिक समाज के लिए गहरा घाव है। यह केवल एक शिक्षिका का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र का अपमान है।
जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और राज्य सरकार अगर चाहें, तो एक फ़ाइल के नोटिंग से शांति कुमारी का 19 साल पुराना दर्द ख़त्म हो सकता है। अगर हम 'नारी शक्ति' का उत्सव मना रहे हैं, तो न्याय को कागजों और सम्मेलनों से निकालकर शेरघाटी की गलियों तक ले जाना होगा—ताकि शांति कुमारी के चेहरे पर मुस्कान लौट आए।

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