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नवरात्रि में कलश स्थापना करने व पूजा/आराधना करने की सरल विधि।

*नवरात्रि एक अवसर है स्वयं के पांडित्य को जागृत करने का।
नवरात्रि 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा है , हम में तमाम लोग इस अवसर पर घर में कलश स्थापना कर विधि विधान से मां की पूजा करते है।
इस अवसर पर हम किसी पुरोहित/ कर्मकांडी को खोजते है कलश स्थापना के लिए ,
जरा सोचिए आपकी कैसी श्रद्धा है कि आपको कलश स्थापना नहीं आती और इसके लिए आप किसी पर निर्भर है।
मां की पूजा/आराधना के लिए आप यदि किसी को माध्यम चुनते है तो यकीनन आपको मिलने वाले पुण्य का एक भाग उसके हिस्से चला जाएगा क्योंकि यह किराए पर कराई गई पूजा आराधना साबित होगी।
अपने और आराध्य के मध्य किसी को न आने दे, आडंबर जरूरी नहीं है ,भक्ति का भाव रखे।

मां आपके भाव देखती है आपकी भक्ति देखती है,आपका आडंबर या ग्लैमर नहीं

अतः आपसे आग्रह है अपने कर्म के संपूर्ण पूर्ण के लिए पूजा अनुष्ठान अपने ही हाथों करे, अपने अंदर के पांडित्य को जागृत करे।


*नवरात्रि में कलश स्थापना करने का तरीका*
कलश को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है.
कलश को धोकर उस पर स्वास्तिक बनाएं और सिंदूर का टीका लगाएं.
कलश के गले में मौली लपेटें.
कलश में गंगाजल भरें.
कलश में हल्दी की गांठ, चांदी का सिक्का, एक हरी इलायची, एक सुपारी, दो लौंग, और थोड़ा कपूर डालें.
कलश में पांच आम के पत्ते रखें.
कलश के ऊपर एक नारियल रखें. नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर और उस पर कलावा बांधें.
कलश को माता रानी के दाहिने हाथ की तरफ़ शेर के मुख की तरफ़ रखें.
कलश स्थापना के लिए पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं.
कलश स्थापना के बाद दीपक जलाकर गणपति, माता जी, नवग्रहों का आवाहन करें.
फिर विधि-विधान से देवी की पूजा करें.


*कलश पर नारियल रखने का तरीका*
नारियल का मुख हमेशा पूजा करने वाले की तरफ़ होना चाहिए.
नारियल को कलश के ऊपर रखा जाता है.
नारियल को चुनरी, कलावा से लपेटकर देवी दुर्गा की मूर्ति उसके ऊपर स्थापित की जाती है.
कलश स्थापना के समय घड़े में चावल, गेहूं, जौ, मूंग, चना, सिक्के, कुछ पत्ते, गंगाजल, नारियल, कुमकुम, रोली डालकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है.
कलश को एक बार स्थापित होने के बाद पूरी नवरात्रि इसको हिलाया नहीं जाता.
कलश पर रखे नारियल से जुड़ी मान्यताएं:
मान्यता है कि इस नारियल को खाना नहीं चाहिए.
अगर नवरात्रि में कलश के ऊपर रखे नारियल पर पौधा उग आए तो इसको बहुत शुभ संकेत माना जाता है.

*कलश स्थापना विधि*
1. चौकी तैयार करें:
पूजा के लिए एक चौकी तैयार करें और उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं.
2. कलश स्थापित करें:
चौकी पर कलश स्थापित करें.
3. कलश में सामग्री डालें:
कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, रोली, हल्दी, दूर्वा, सुपारी, आम के पत्ते डालकर उसे ढक दें.
4. नारियल स्थापित करें:
नारियल को कलावा से बांधकर कलश के ऊपर रखें.
5. जौ बोएं:
एक पात्र में मिट्टी भरकर उसमें जौ बोएं और उसे चौकी के पास रखें.
6. आहवन करें:
दीप जलाकर गणपति, माता जी, नवग्रहों का आवाहन करें.
7. पूजा करें:
फिर विधि-विधान से देवी की पूजा करें.
*कलश स्थापना मंत्र*
"ऊँ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः".

*कलश में जल डालने का मंत्र*
"ऊँ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद".

*मां दुर्गा का आह्वान मंत्र*
"ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते".

ध्यान रखने योग्य बातें:
कलश की स्थापना पूर्व या उत्तर दिशा या फिर ईशान कोण में करें.
कलश में गंगाजल, सिक्का, रोली, हल्दी, दूर्वा, सुपारी, आम के पत्ते डालें.
कलश के ऊपर नारियल रखें.
कलश स्थापना के बाद देवी की पूजा करें.
व्रत का संकल्प लें.
सफेद फूल, माला, सिंदूर, कुमकुम, अक्षत, सफेद मिठाई, घी का दीपक, धूप जलाएं.
मां शैलपुत्री मंत्र, मां दुर्गा मंत्र स्तोत्र, कवच आदि का पाठ करें.
आरती करें और अनजाने में हुई गलतियों के लिए माफी मांगें.

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