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भारत का कर्ज : हकीकत या चुनौतियां ।

"पुरखों ने छोड़ी थी विरासत में हरियाली और दुआएं,
हम छोड़ रहे हैं औलादों की खातिर किस्तों की बलाएं।"

आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक चमक बिखेर रहा है, तब एक मध्यमवर्गीय पिता की माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। यह चिंता महंगाई की नहीं, बल्कि उस अदृश्य बेड़ी की है जो उसके नवजात बच्चे के छोटे-छोटे पैरों में जन्म के साथ ही जकड़ दी गई है।

कल्पना कीजिए, एक माँ अपने बच्चे को पहली बार गोद में लेती है, उसे चूमती है और एक बेहतर भविष्य का सपना देखती है। लेकिन क्या उसे पता है कि उसी पल उसके बच्चे के मासूम सिर पर ₹1.5 लाख से ₹4.8 लाख तक का कर्ज लद चुका है?

भारत पर बढ़ता ₹200 लाख करोड़ का यह कर्ज कोई सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस बच्चे के हिस्से की रोटी, उसकी शिक्षा और उसके हक की कमाई पर एक अग्रिम डाका है।

राजनीतिक रैलियों में जब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच "मुफ्त की रेवड़ियाँ" बांटी जाती हैं, तो दूर बैठा एक ईमानदार टैक्सपेयर अपनी जेब टटोलता है। वह स्कूटी, वह मोबाइल और वह नकद राशि किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि उस मध्यमवर्गीय व्यक्ति की "गाढ़ी कमाई" है, जो अपनी जरूरतों को मारकर टैक्स भरता है।

वह इनकम टैक्स देता है ताकि देश चले, वह GST देता है ताकि बुनियादी ढांचा बने। बावजूद इसके, जब उसके घर में कोई बीमार पड़ता है, तो उसे मुफ्त इलाज नहीं मिलता। जब उसके बच्चे बड़े होते हैं, तो उसे प्राइवेट कॉलेजों की भारी फीस भरनी पड़ती है।

सच्चाई यह है कि मध्यमवर्ग आज उस इंजन की तरह है जो पूरी ट्रेन को खींच रहा है, लेकिन उसे ही पटरी से उतारने की पूरी तैयारी की जा रही है।

सरकार कहती है कि कर्ज हाईवे और एयरपोर्ट के लिए है। हम स्वागत करते हैं! बुनियादी ढांचा देश की रीढ़ है।

लेकिन जब सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने के लिए खजाने का मुंह "लोकलुभावन" वादों के लिए खोल दिया जाता है, तब "आर्थिक आत्महत्या" की शुरुआत होती है। श्रीलंका और पाकिस्तान हमारे सामने जीते-जाते उदाहरण हैं। क्या हम भी उसी गड्ढे की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ "उधार लेकर घी पीना" एक संस्कृति बन गई है?

अब वक्त आ गया है जब हमें चुप्पी तोड़नी होगी बिहार जैसे राज्यों से लेकर समृद्ध राज्यों तक, चुनाव से पहले पैसे बांटने की होड़ देश की आर्थिक सेहत के साथ खिलवाड़ है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाएं एक उम्मीद की किरण जरूर हैं, लेकिन असली बदलाव "जनता की चेतना" से आएगा।

हमें सरकारों से 'भीख' नहीं, 'संसाधन' चाहिए। हमें मुफ्त की बिजली नहीं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। हमें खैरात नहीं, रोजगार के अवसर चाहिए।


अगर आज हम अपनी खामोशी नहीं तोड़ेंगे, तो कल हमारे बच्चे हमसे पूछेंगे कि जब देश को मुफ्तखोरी की आग में झोंका जा रहा था, तब आप कहाँ थे? हमें एक ऐसा भारत बनाना है जहाँ बच्चा "स्वाभिमान" के साथ पैदा हो, न कि "साहूकार के कर्ज" के साथ।

वक्त आ गया है कि 'रेवड़ी' और 'रोटी' के बीच का फर्क समझा जाए। कहीं ऐसा न हो कि मुफ्त के लालच में हम अपने बच्चों का कल ही बेच दें।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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