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भारतीय लोकतंत्रात्मक राष्ट्रीय विकास में ग्रामपंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के कृषि,आय के संसाधनों पर बजट ना कि ईंट,बालू सीमेंट में क्योंकि 75%कृषि

उत्तर प्रदेश
भारत कृषि प्रधान देश है राष्ट्र के विकास के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक संसाधनों और उसमें श्रम शक्ति कौशल तकनीकी एवं प्रसंस्करण में उपयोगिता के आधार पर ही हम आर्थिक विकास रोजगार सृजन कौशल विकास जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों के लिए प्रयासरत और आत्मनिर्भर बन जा सकता है।
प्रमुख रूप से ग्राम पंचायत में कृषि क्षेत्र में परंपरागत खेती के इतर अभी तक हम ध्यान नहीं दे सके जिस तरह हमें आयुर्वेदमेडिकल कॉलेज की शुरुआत किया गया ठीक उसी प्रकार हमें आयुर्वेद के संसाधन जो की प्रमुख रूप से कृषि आधारित है और प्राकृतिक के द्वारा दिव्य औषधि का विकास संवर्धन और विपणन की नीति को सही ढंग से लागू किया जाए तो मनुष्य के मौलिक अधिकारों का आरक्षण ही नहीं स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत का आमूलचूल परिवर्तन सुनिश्चित होगा ।
ग्राम पंचायत के कृषि क्षेत्र के लिए एक सामूहिक कृषि मॉडल रूप में विकसित किया जा जिसमें कम से कम 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में कृषि ने औषधि खेती सब्जी उत्पादन और उसके विप्राण की सटीक बाजार की उपलब्धता और जिस तरह सरकार की नीतिगत है की 100 ग्राम पंचायत के लगभग नित निर्देशन करने के लिए ब्लॉक स्तर है तो ठीक उसी प्रकार से सभी ग्राम पंचायत का एक प्रमुख किसान केंद्र हर ब्लॉक पर स्थित हो जहां पर किसानों को उचित लाभ और धरातल पर विकास की रूपरेखा ग्राम पंचायत में तय किया जाए।
पंचायत राज विभाग में यह देखने को मिलता है कि विकास के रूपरेखा ईट बालू सीमेंट के 80% भुगतान हो जाता है लेकिन आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के लिए किसी भी व्यवस्था और मानदंड का नीति नहीं बनाया गया। निश्चित तौर पर स्वयं सहायता समूह पर सरकार द्वारा लगभग प्रत्येक ग्राम सभा में न्यूनतम 10 लाख से 20 लख रुपए कर्ज दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता है समूह द्वारा ब्याज भरना और कर्ज को एक लिमिट के बाद चुकता कर देने के आगे कुछ भी नहीं आखिर समूहों के आए और वह की लेखा जोखा होनी चाहिए और आत्मनिर्भर भारत के लिए जिला उद्योग केंद्र कृषि विज्ञान अधिकारी द्वारा एक ग्राम पंचायत के आय के साधन का नीतिगत निर्णय लिया जाना चाहिए।
निश्चित तौर पर सरकार द्वारा ग्राम पंचायत में श्रमिकों के लिए न्यूनतम वर्तमान समय में 125 दिन का कार्य योजना दिया गया है लेकिन वास्तविक तौर पर ग्राम पंचायत अध्यक्ष एवं सचिव द्वारा इस 125 दिन के कार्य की प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को रोजगार की इस परियोजना से जोड़ने का प्रयास होना चाहिए जिसमें की मासिक रूप से एक परिवार को न्यूनतम ₹2500 या 8 दिन का मासिक कार्य योजना के तहत उपलब्ध कराई जाएं।
जिस तरह हम देखते हैं कि हर जिले में आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज खोली जाएगी तो क्यों ना हर ग्राम पंचायत में एक औषधि क्षेत्र का विकास हो या चार गांव को मिलाकर एक क्षेत्र में औषधि पौधारोपण और उसके विपणन और बाजार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए किसानों को आय बढ़ाने महत्वपूर्ण आधार होगा।
ग्राम पंचायत में आवागमन के सड़क, स्वच्छता और स्वास्थ्य से गंभीर मुद्दों पर ध्यान देते हुए हमें यह देखना होगा कि हर पंचवर्षीय योजना में पंचायत या अन्य विभागों द्वारा बजट का मूल रूप हम ईट बालू सीमेंट तक ही सीमित रख देते हैं और ग्राम पंचायत के आय के साधन का विकास की नीतिगत निर्णय नहीं हो पाती है दो पंचवर्षीय योजनाओं के खर्च को देखते हुए आखिर हमें हर पंचवर्षीय योजना में एटा बालू सीमेंट तक ही सीमित क्यों रखना पड़ा इसकी समीक्षा एवं जांच जनहित के मौलिक अधिकारों की दृष्टिगत होनी चाहिए जिससे सरकार और ग्राम पंचायत अध्यक्ष एवं विभागीय अधिकारियों उत्तरदायित्व निर्वाहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।
निश्चित तौर पर जब तक ग्राम पंचायत आत्मनिर्भर नहीं होता तब तक हम विकसित भारत की परिकल्पना को को साकार करने में कठिनाई होगा । नगर पालिकाओं के तरह ग्राम पंचायत में भी पेयजल आपूर्ति की बहाली सुनिश्चित किया जाए हाट बाजारों की व्यवस्था की जाए कुटीर उद्योग की व्यवस्था की जाए एक नीतिगत निर्णय के आधार पर श्रमिकों को रोजगार सृजन के अवसर दिए जाएं और ब्लॉक स्तर पर एक बहुउद्देशीय रोजगार क्षेत्र का विकास किया जाए जिससे हम विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करते हुए आत्मनिर्भर विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त कर सकें ।
कृष्ण कुमार पाठक
देवनागरी सम्मान, मातृभाषा रत्न
लेखक/पत्रकार

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