एक अध्यापक का मौन त्याग और समाज की जिम्मेदारी
समाज में शिक्षक का स्थान हमेशा से अत्यंत सम्मानित और महत्वपूर्ण रहा है। एक अध्यापक केवल किताबों का ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि अपने अनुभव, अपने संस्कार और अपने जीवन की सीख भी अपने छात्रों को सौंपता है। वह अपनी पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी के साथ अपने ज्ञान के भंडार को खोल देता है और अपने छात्रों को उस ज्ञान से अभिसिंचित करता है। उसके मन में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता, न ही किसी लाभ की अपेक्षा। उसका एकमात्र उद्देश्य होता है कि उसके छात्र जीवन की चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनें और समाज में अपना एक सम्मानजनक स्थान बना सकें।
अध्यापक का ज्ञान एक अथाह सागर की तरह होता है। उस सागर से छात्र अनेकों मोती चुनते हैं और उन्हीं मोतियों की चमक से अपने जीवन को रोशन करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। कोई डॉक्टर बनता है, कोई इंजीनियर, कोई अधिकारी, तो कोई सफल व्यवसायी बनकर समाज में अपनी पहचान बनाता है। इन सबकी सफलता के पीछे कहीं न कहीं उस अध्यापक का अथक परिश्रम, धैर्य और त्याग छिपा होता है।
लेकिन जीवन की एक सच्चाई यह भी है कि जिस शिक्षक ने अपने छात्रों को उड़ान भरने के लिए पंख दिए, वह स्वयं अक्सर उसी स्थान पर खड़ा रह जाता है। वह हर वर्ष नई पीढ़ी को पढ़ाता है, उन्हें मार्गदर्शन देता है और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करता रहता है। उसके लिए हर छात्र एक नई उम्मीद होता है, एक नया सपना होता है।
समय के साथ छात्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। वे अपने काम, परिवार और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि कभी-कभी उन्हें यह याद भी नहीं रहता कि उनके जीवन की मजबूत नींव किसने रखी थी।
तब मन में एक प्रश्न उठता है—
क्या कभी उन छात्रों ने यह जानने की कोशिश की कि जिनके कारण वे आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं, वह शिक्षक आज किस स्थिति में है?
क्या कभी उन्होंने यह सोचा कि शायद आज उस गुरु को उनके एक हालचाल की आवश्यकता हो?
सच तो यह है कि शिक्षक को अपने छात्रों से किसी बड़े उपहार या सम्मान की अपेक्षा नहीं होती। उसके लिए तो एक छोटी सी मुलाकात, एक स्नेह भरा अभिवादन या एक धन्यवाद का शब्द ही सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
यह बात सुनने में भले ही थोड़ी कड़वी लगे, लेकिन वास्तविकता अक्सर ऐसी ही होती है। शिक्षक अपना पूरा जीवन दूसरों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में लगा देता है, परंतु बदले में उसे अक्सर केवल यादों का सहारा ही मिलता है।
फिर भी एक सच्चा अध्यापक कभी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता। वह हर नई पीढ़ी को उसी समर्पण और ईमानदारी के साथ शिक्षा देता है, क्योंकि वह जानता है कि समाज की असली शक्ति शिक्षा और संस्कार ही हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को केवल शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि समय-समय पर उनका हालचाल पूछें, उनसे मिलने जाएं और यह एहसास दिलाएं कि उनका दिया हुआ ज्ञान और संस्कार आज भी हमारे जीवन का सबसे बड़ा आधार हैं।
क्योंकि सच यही है कि
एक शिक्षक कभी बूढ़ा नहीं होता, वह अपने छात्रों की सफलताओं में हमेशा जीवित रहता है।
— राजकुमार अश्क़