जननी से वीरांगना तक: भारतीय नारी का गौरव और आज का यथार्थ ।
"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ।"
-सुभद्रा कुमारी चौहान
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला: क्रिया:।।"
(अर्थात: जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ इनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं।)
भारत की भूमि उस नारी शक्ति की गवाह रही है जिसने समय-समय पर दुनिया को दिशा दिखाई है। माता "सीता" की पावनता और मर्यादा हो, या रानी "पद्मावती" का वह "जौहर" जिसने आतताइयों के सामने झुकने के बजाय अग्नि को गले लगाना स्वीकार किया—यह सब नारी के अदम्य आत्म-सम्मान के प्रतीक हैं।
जब देश की अस्मिता पर आंच आई, तो "झांसी की रानी लक्ष्मीबाई" ने तलवार उठा ली। "किरण बेदी" ने अनुशासन की नई परिभाषा लिखी, तो "कल्पना चावला" ने अंतरिक्ष में तिरंगा फहराया। एक माँ के रूप में नारी नौ महीने कष्ट सहकर जिस शिशु को जन्म देती है, वह केवल एक जीवन नहीं, बल्कि एक भविष्य का निर्माण करती है। पुरुष की जिम्मेदारी जहाँ सीमित हो सकती है, वहीं एक स्त्री का उत्तरदायित्व असीमित है, क्योंकि वह "गृहलक्ष्मी" बनकर पूरे परिवार और समाज की धुरी बनी रहती है।
नारी शक्ति, त्याग और करुणा की प्रतिमूर्ति है। जहाँ एक ओर इतिहास की गौरवगाथाएँ उनके बलिदान से लिखी गई हैं, वहीं आधुनिक समाज की कुछ विसंगतियाँ आत्म-चिंतन की मांग करती हैं ।
किन्तु, आज के 'कलियुगी' परिवेश में कुछ घटनाएँ मन को व्यथित करती हैं। जिस देश ने नारी को 'देवी' माना, वहाँ 'सस्ती लोकप्रियता' के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगाना चिंता का विषय है। सोशल मीडिया के इस दौर में रील संस्कृति और अंग-प्रदर्शन के माध्यम से क्षणिक प्रसिद्धि पाने की चाहत ने भारतीय संस्कारों की जड़ों को हिला दिया है।
पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते में हिंसा या विश्वासघात की खबरें (जैसे आपसी विवाद में जान लेना) समाज के नैतिक पतन को दर्शाती हैं।
विवाह से पूर्व और विवाह के पश्चात अनैतिक संबंधों की बढ़ती प्रवृत्ति उस "संस्कारवान भारत" की छवि को धूमिल करती है, जहाँ नारी का चरित्र उसकी सबसे बड़ी पूंजी माना जाता था।
हमें यह समझना होगा कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में एक महीन रेखा होती है। आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों और अपनी मर्यादाओं को भूलना नहीं है। यदि एक नारी समाज को 'संस्कारित' करने की क्षमता रखती है, तो उसके पथभ्रष्ट होने से समाज का पतन भी निश्चित है।
आज आवश्यकता है कि हम "इन्दिरा गांधी" की दृढ़ता, "सरोजिनी नायडू" की विद्वत्ता और "रानी चेन्नम्मा" के साहस को अपना आदर्श बनाएं। नारी केवल प्रेम की प्रतीक ही नहीं, बल्कि वह मर्यादा की रक्षक भी है। उसे स्वयं यह तय करना होगा कि वह 'उपभोग की वस्तु' बनकर रहना चाहती है या उस 'शक्ति' के रूप में जिसकी वंदना पूरा विश्व करता है।
महिला दिवस केवल शुभकामनाओं का दिन नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का दिन है। समाज की हर बेटी और महिला को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे अपनी आधुनिक प्रगति के साथ-साथ उन प्राचीन भारतीय मूल्यों को भी जीवित रखेंगी, जिन्होंने भारत को 'विश्व गुरु' बनाया था। नारी का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब वह स्वयं अपनी गरिमा और चरित्र की रक्षक बनेगी।
"प्रणाम है उन महान माताओं और वीरांगनाओं को, जिन्होंने इस धरा को स्वर्ग बनाया!"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT