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यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को प्रोत्साहन) विनियम, 2026 : समानता के नाम पर उत्पन्न विरोधाभास..

भारतीय लोकतंत्र का मूल तत्व यह है कि कानून समाज में सामंजस्य, न्याय और समान अवसर स्थापित करे। यदि कोई कानून समानता के उद्देश्य से बनाया जाए, किंतु व्यावहारिक रूप से वही कानून समाज में अविश्वास, विवाद और विभाजन का कारण बनने लगे, तो उसकी वैधता और औचित्य पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।

इसी संदर्भ में University Grants Commission द्वारा अधिसूचित यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को प्रोत्साहन) विनियम, 2026, विशेषतः विनियम 3(ग), व्यापक विवाद का कारण बना। इसकी अस्पष्ट और अत्यधिक व्यापक परिभाषा के कारण आशंका व्यक्त की गई कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में संवाद और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के स्थान पर भय और परस्पर आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

इसी कारण Supreme Court of India ने 29 जनवरी 2026 को इस प्रावधान पर स्थगन आदेश (स्टे) प्रदान किया। यह घटना स्वयं इस तथ्य का संकेत है कि किसी भी नियम को लागू करने से पूर्व उसकी संवैधानिक और व्यावहारिक समीक्षा अत्यंत आवश्यक होती है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(क) और 21 समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमामय जीवन के अधिकार की रक्षा करते हैं। यदि कोई विनियम अपनी अस्पष्टता या संभावित दुरुपयोग के कारण इन अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, तो वह संविधान की भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता।

व्यावहारिक दृष्टि से भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है—
यदि समानता स्थापित करने के लिए बनाया गया कानून ही समाज में आपसी संघर्ष, भय और अविश्वास को बढ़ावा दे, तो क्या वह वास्तव में समानता की स्थापना कर सकता है?

इसलिए आवश्यक है कि नीति-निर्माता इस विषय पर गंभीर पुनर्विचार करें। जब तक ऐसे प्रावधान स्पष्ट, संतुलित और संविधान-सम्मत रूप में पुनर्गठित नहीं किए जाते, तब तक उनका निरसन या वापसी ही एक व्यवहारिक और न्यायसंगत विकल्प माना जा सकता है।

अतः लोकतांत्रिक विमर्श और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह मांग स्वाभाविक है कि—

“यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को प्रोत्साहन) विनियम, 2026 को पुनः परीक्षण हेतु वापस लिया जाए — #UGC_RollBack।”

(AI Generated Image)

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