*मृत्युभोज: एक सामाजिक अभिशाप*
जयशंकर सिंह भदौरिया
स्वतंत्र पत्रकार, बांका, बिहार
बांका, 7 मार्च 2026:
भारतीय समाज में कई परंपराएं ऐसी हैं जो समय के साथ अपनी मूल भावना से भटक कर सामाजिक बोझ बन गई हैं।ऐसी ही एक कुप्रथा है 'मृत्युभोज'। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिवार द्वारा बड़े पैमाने पर भोज का आयोजन करना परंपरा के नाम पर आज एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है।
जब किसी परिवार पर अपने प्रियजन की मृत्यु का दु:ख होता है,उस समय उन्हें सांत्वना और सहारे की आवश्यकता होती है। लेकिन 'मृत्युभोज' की प्रथा उस दुखी परिवार पर आर्थिक और सामाजिक दबाव डाल देती है। समाज के भय और लोकलाज के कारण कई परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर भोज का आयोजन करते हैं। इसके लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ता है, जो वर्षों तक उनके लिए बोझ बना रहता है और कभी-कभी तो यह बोझ उतारने के लिए उन्हें अपनी जमीन तक बेचना पड़ जाता है।
यह प्रथा सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है। संपन्न लोग दिखावे के लिए भव्य भोज करते हैं, जिससे गरीब परिवारों पर भी वैसा ही करने का दबाव बना रहता है। परिणामस्वरूप दुख की इस विषम वेला में भी लोग दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ में अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को हवन कर देते हैं।
वास्तव में किसी मृत व्यक्ति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भव्य भोज नहीं, बल्कि उसके आदर्शों और संस्कारों को जीवन में अपनाना है। समाज को चाहिए कि वह इस कुप्रथा का बहिष्कार करे और शोकग्रस्त परिवार को अनावश्यक खर्च के लिए बाध्य न करे।
आज समय की मांग है कि हम जागरूक बनें और 'मृत्युभोज' जैसी कुरीतियों को त्यागकर एक संवेदनशील और विवेकपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएं। तभी हम परंपरा और मानवता के बीच सही संतुलन स्थापित कर सकेंगे।
नोट: यह आलेख समर्पित है संवेदनशील कर्मयोगी और निश्छल समाजसेवी सोनू खंडेलवाल जी, भागलपुर वाले को जिन्होंने इस विषय पर कलम चलाने के लिए मुझे प्रेरित किया।