कुछ तो करो कोई तो आगे आओ
समझ में नहीं आता कि कहां से शुरू करूं। चलिए ११ अशोका रोड, भाजपा मुख्यालय से शुरू करता हूं। ये वो दौर था जब वाजपेई, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और दूसरे अनेक भाजपा नेताओं की तूती बोलती थी मीडिया हर वक्त इनके आगे पीछे भागती थी। ऐसे में एक शख्स भाजपा के आफिस के एक छोटे से कमरे में बैठा तकरीबन मक्खियां मार रहा होता कभी कभी कमरे से बाहर निकल आता और मीडिया वालों से कहता " भाई कभी मेरे पास भी आ जाया करो और नहीं तो चाये पानी पी लिया करो" लेकिन कोई उसकी बात नहीं सुनता और अंजाम कार जितना मीडिया उससे दूर होती रही वो उतना ही हीन भावना का शिकार होता गया। अचानक एक दिन समय ने करवट ली और वो शख़्स रातों-रात फर्श से अर्श पर पहुंच गया यानी भाजपा ने उसे गुजरात का मुख्य मंत्री बना दिया। अब आप समझ गए होंगे कि वो शख़्स कौई और नहीं नरेंद्र दामोदर दास मोदी था। मीडिया का सताये हुए हीन भावना के शिकार मोदी मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले गुजरात मीडिया की नथ उतारी और उसे अपनी रखेल बना लिया। इस अंतराल में दुनिया भर में बदनाम अमित शाह से इस का दोस्ताना हुआ और राजनीतिक, अनेतिक कुकर्मों का एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसकी मिसाल नहीं मिलती 1992 के संप्रदायक दंगे और फर्ज़ी एनकाउंटर इस सिलसिले की एहम कड़िया हैं जिसके लिए उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि " ये सब देखकर उनका सर शर्म से झुक गया है" और कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने इन्हें " मौत का सोदागर कहा था"। खेर आगे बढ़ते हैं।2012 में लोकसभा चुनाव की तयारी शुरू हो गई। गुजरात में मोदी, अमित शाह, मुकेश अंबानी अडानी और दूसरे अनेक पूंजीपतियों ने राजनीतिक बिसात बिछाई । मोदी महान् स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के शब्दों को मोड़ कर सबसे ऐक ही बात कही " तुम मुझे प्रधानमंत्री पद दिलाओ मैं देश की जनता को तुम्हारे कदमों में डाल दूंगा" ऐक अंदाज़े के अनुसार तकरीबन 17 हज़ार करोड़ रुपए का जुगाड़ किया गया जिसका इस्तेमाल प्रचार प्रसार पर होना था। बहुत सोच समझकर प्रचार प्रसार का काम अंबानी अडानी को सोंपा गया इन दोनों ने सबसे पहला काम ये कि देश के सबसे बड़े नियुज़ चैनलों और अख़बारों को नोटों की हड्डीयां डालीं जो राज़ी से मान गया उसके पो बारह जो नहीं माना वो अमित शाह के हवाले कर दिया गया। मोदी आधी राजनीतिक लड़ाई जीत गए क्योंकि मीडिया उनसे वही सवाल पूछती जो उन्हें लिख कर दिए जाते थे। इस बीच पर्सनलिटी डेवलपमेंट एजेंसीयों से संपर्क किया गया जिन्होंने मोदी का कायाकल्प किया और ये महाशय ऐक साल में ही प्रधानमंत्री की तरह चलने बोलने लगे। लेकिन अब भी जनता को भरोसा नहीं हो पा रहा था कि ये शख़्स ऐक अच्छा जनता दोस्त प्रधानमंत्री साबित होगा। सभी महारथी सर जोड़ कर बैठे इस बात पर विचार विमर्श किया कि कांग्रेस किया करती है और भाजपा किया करे, पता चला कि कांग्रेस अपने ज़मीनी कार्य कर्ताओं को सिवाये खोखले वादों के कुछ नहीं देती बस फिर क्या था एक आई टी सेल बनाया गया। और इसके माध्यम से भाजपा के ज़मीनी कार्य कर्ताओं को प्रोत्साहित करने हेतु एक मुनासिब धन राशि मुकर्रर की गई जो उन्हें आज तक मिल रही है इस रणनीति ने पासा पलट दिया और 2013 के मध्य तक पुरा देश भाजपामई हो गया था। मैं इस बहस में नहीं पड़ता कि चुनाव मशीनों और चुनाव आयोग का दुरुपयोग किया गया लेकिन ये सच्चाई है कि चुनाव सिर्फ औपचारिकता भर रह गए थे और 2014 में नये युग का परीवर्तन सबके सामने था।एक नया भारत बनेगा ऐसा सब सोच रहे थे जिन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया वो भी और जिन्होंने नहीं पहुंचाया वो भी। जेसे जेसे समय गुज़रने लगा ऐक कुंठित मानसिकता और हीन-भावना का शिकार प्रधानमंत्री सामने आने लगा जिसने सबसे पहले भाजपा के सिनीयर नेताओं को ठिकाने लगाया फिर उन पत्रकारों को जिन्होंने और जिनके मालिकों ने 11 अशोका रोड भाजपा मुख्यालय पर इनकी अनदेखी की थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि नरेंद्र मोदी के अमरीका में प्रवेश पर पाबंदी लगाई गई थी वजह क्या थी मुझे नहीं पता लेकिन बड़ी भाग दौड़ कर के इन पर लगी पाबंदी हटवाई गई और जनाब पहली ही फुर्सत में अमरीका पहुंच गए। उसके बाद पता नहीं क्या हुआ अमरीका झुकाता चला गया और बादशाह सलामत झुकते चले गए। अमरीका के इशारों पर ऐसे नाचने लगे कि फिलीस्तीन को छोड़कर इसराइल को अब्बा बना लिया, रूस को छोड़ दिया, पड़ोसी देशों को छोड़ दिया। डालर के सामने भारती रूपिया पैरों में आ गया। हज़ारों सेंकड़ों साल बाद भी भारत में ईरान के वंशंज हैं रामायण और महाभारत में भी जिनका ज़िक्र मिलता है उस ईरान से किनारा कर लिया। ये सिर्फ एपसटीन फाइल्स की वजह से हो रहा है इस में शक है। मोदी की कौई ऐसी नस अमरीका में दबी हुई है जिसका किसी को पता नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो ट्रम्प ये कभी नहीं कहता कि वो "मोदी का राजनीतिक करियर खत्म कर सकता है" इस वक्त अमरीका भारत के आका की तरह पैश आ रहा है ये भी इसी तरफ इशारा कर है कि मोदी दीमागी तौर पर अमरीका के हाथों अगवा हो चुके हैं। हद तो ये है कि भारत पर रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी लगा चुका अमरीका 30 दिन तेल खरीदने की इजाजत देता है तो मीडिया बैनर बना रही है कूटनीतिक सफलता बता रही है तालियां बजा रही है मोदी की पीठ थपथपा रही है। अबे डूब मरो, अमरीका कौन होता है हमें इजाज़त देने वाला हम खुद अपने मालिक हैं जो चाहें खरीदें बेचें। मैं देश की मोजुदा हालत पर चिंतित भी हूं दुःखी भी हूं और हैरान भी। माना कि मोदी दीमागी तौर पर अमरीका के गुलाम हो गये हैं। क्या राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट, सी डी ऐस भी अंधे बहरे हो गये हैं?। क्या इन्हें दिखाई नहीं देता कि सेंकड़ों, हज़ारों लाखों आज़ादी के परवाने शहीदों की चिताओं पर टिका ये देश एक बार फिर एक कुंठित और हीन-भावना के शिकार प्रधानमंत्री की वजह से ग़ुलामी की तरफ बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि नौजवान पीढ़ी नेताओं से मायूस जनता की आखरी उम्मीद होती है। नेपाल से सीख लेकर कम से कम वही सड़कों पर उतर आए और इस देश को ग़ुलाम होने से बचाये।
देस राज मुज़तर