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baarood ki holi / बारूद की होली .मेनार गांव, जो उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है , 400 वर्षों से चली आ रही परंपरा

बारूद की होली

5 मार्च 2026

विधानसभा - वल्लभ नगर
Report By -रिपोर्टर शंकर लाल सरगरा
(N8news, rajasthan, editor-Nishant pandit )

अनोखी और ऐतिहासिक होली

यूँ तो आपने रंगों के त्योहार होली को अलग-अलग अंदाज़ और परंपराओं के साथ मनाते देखा होगा, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी ऐतिहासिक होली के बारे में बता रहे हैं, जिसके बारे में शायद आपने न कभी सुना होगा और न ही सोचा होगा।

400 साल से चली आ रही है परम्परा

मेनार गांव, जो उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है, वहां होली के दूसरे दिन यह पर्व अनोखे अंदाज़ में मनाया जाता है। लगभग 400 वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां होली बारूद से खेली जाती है।

होली के दूसरे दिन ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में आधी रात को गांव के चौपाल पर एकत्र होते हैं और जमकर बारूद की होली खेलते हैं। इस आयोजन को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो होली नहीं, बल्कि दीपावली मनाई जा रही हो।

बंदूको से हवाई फायर, बंदूके दागी जाती है

इस दिन ग्रामीण न केवल आतिशबाजी करते हैं, बल्कि बंदूकों से सैकड़ों हवाई फायर भी किए जाते हैं। एक के बाद एक बंदूकें दागी जाती हैं और धमाकों के बीच ग्रामीण नाचते-गाते हुए खुशियां मनाते नजर आते हैं।

देश ही नहीं बल्कि विदेशो से भी आते है मेहमान

इस होली की खास बात यह है कि इस आयोजन में शामिल होने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले मेनार गांव के लोग भी विशेष रूप से अपने गांव पहुंचते हैं।

बारूद की इस होली को देखने के लिए सैकड़ों लोग जुटते हैं। गांव का हर व्यक्ति इस दिन के लिए विशेष तैयारी करता है। एक समय ऐसा भी आता है जब ग्रामीणों के दो समूह आमने-सामने खड़े होकर हवाई फायर करते हुए जश्न मनाते हैं।

ग्रामीणों का मानना है कि मुगल काल में महाराणा उदयसिंह के समय मेनारिया ब्राह्मणों ने मेवाड़ राज्य पर हुए आक्रमण का साहस और रणनीति से मुकाबला किया था। उसी विजय की स्मृति में यह त्योहार आज भी विशेष अंदाज़ में मनाया जाता है।

पूरी रात बंदूको की गूंज, आतिशबाजी, और वेशभूषा मे गैर नृत्य

पूरी रात बंदूकों की गूंज और आतिशबाजी के साथ जश्न चलता है। साथ ही पारंपरिक ‘गेर’ नृत्य भी खेला जाता है, जिसमें ग्रामीण तलवारों के साथ विशेष अंदाज़ में प्रदर्शन करते हैं।

इस अनोखी होली का साक्षी बनने के लिए आसपास के गांवों के लोग और दूर-दराज से आए दर्शक भी पूरी रात मौजूद रहते हैं। बंदूकों के साथ-साथ तोपें भी दागी जाती हैं और लाखों रुपये के पटाखे जलाए जाते हैं।

हालांकि सैकड़ों लोगों की भीड़ में पटाखे छोड़ना, बंदूक और तोप चलाना जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि मां अंबे की कृपा और अपनी पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखने की भावना के कारण आज तक इस आयोजन में कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ है।

बहरहाल, मेनार की यह बारूद की होली आज भी शौर्य, परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम बनी हुई है।







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