विशेष रिपोर्ट: पछवादून में 'सीज और बहाली' का खेल; छोटे ट्रैक्टरों पर कार्रवाई... मगरमच्छों को मौन संरक्षण!
नियमों को ठेंगा दिखा रहे स्टोन क्रशर, किसानों की बर्बादी और धूल के गुबार के बीच दम तोड़ते मानक
विकासनगर (इंद्रपाल सिंह)।
पछवादून क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ विभागीय कार्रवाई अक्सर सुर्खियों में रहती है, लेकिन इन कार्रवाइयों के पीछे का सच 'हाथी के दांत' जैसा नजर आता है। ढकरानी और ढालीपुर में हालिया छापेमारी के दौरान चंद ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और छोटे वाहन मालिकों को सीज कर विभाग अपनी पीठ तो थपथपा रहा है, लेकिन बड़ा सवाल उन 'अदृश्य ताकतों' पर है जिनके इशारे पर सीज किए गए पट्टे कुछ ही दिनों बाद फिर से बहाल कर दिए जाते हैं। आखिर कानून से बड़ी वो कौन सी ताकत है, जिसके आगे विभागीय मानक दम तोड़ देते हैं?
किसानों की फसलों पर 'धूल और वेस्टेज' की मार
ढकरानी क्षेत्र में संचालित कई स्टोन क्रशर आज किसानों के लिए अभिशाप बन चुके हैं। आबादी और धार्मिक स्थलों से तय दूरी के मानकों को ताक पर रखकर ये प्लांट न केवल प्रदूषण फैला रहे हैं, बल्कि इनसे निकलने वाला वेस्टेज सीधे किसानों के खेतों और स्वच्छ जल स्रोतों में समा रहा है।
मानकों के अनुसार आबादी से जो दूरी होनी चाहिए, धरातल पर उसकी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। किसानों की लहलहाती फसलें अब क्रशरों से उड़ने वाली धूल और मलबे की भेंट चढ़ रही हैं, लेकिन प्रशासन इन 'बड़े संचालकों' पर हाथ डालने से कतरा रहा है।
स्टॉक का मायाजाल: ऊपर पहाड़, नीचे खाई
सूत्रों की मानें तो इन क्रशरों में खनिज सामग्री के भंडारण का खेल भी निराला है।
जितना स्टॉक जमीन के ऊपर नजर आता है, उससे कहीं अधिक अवैध रूप से जमीन के भीतर (अंडरग्राउंड) दबाकर रखा गया है।
इसके अलावा, नदी के बीचों-बीच से बनाए गए अवैध रास्ते विभागीय दावों को खुली चुनौती दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या जलधारा के बीच से भारी वाहनों के लिए रास्ता बनाना नियमानुसार है? या फिर 'ऊपर' तक पहुंच रखने वाले रसूखदारों के लिए नियम-कानून मायने ही नहीं रखते?
राजधानी के 'सफेदपोशों' का कवच!
चर्चा है कि क्षेत्र के कई क्रशर संचालक राजधानी में बैठे रसूखदार नेताओं के साथ अपनी करीबी का हवाला देकर स्थानीय प्रशासन को बौना साबित कर रहे हैं। यही कारण है कि कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे मेहनत-कशों और वाहन स्वामियों को निशाना बनाया जाता है, जबकि बड़े सिंडिकेट और नियम विरुद्ध चल रहे क्रशरों की फाइलें दबी रह जाती हैं। जनता पूछ रही है कि क्या प्रशासन कभी इन 'बड़े मगरमच्छों' के रसूख को तोड़ पाएगा या फिर पट्टों को सीज और बहाल करने का यह खेल यूँ ही जारी रहेगा?