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होली: रंगों का उत्सव, समरसता का संगम दहक उठे टेसू के वन, शीतल समीर अब डोल रही,

होली: रंगों का उत्सव, समरसता का संगम
दहक उठे टेसू के वन, शीतल समीर अब डोल रही,
बसंती चोला पहन प्रकृति, मादकता के द्वार खोल रही।
फागुन की उस भीनी खुशबू में, मन मोर सा नाच उठा,
ऋतुराज के इस वैभव से, सारा उपवन जाग उठा।
हास्य, परिहास और उमंग अबीर उड़े, गुलाल उड़े, और उड़े मन की सब पीर,
ठिठोली की बौछारें भीगीं, रंग गया है सबका चीर।
कहीं चले मीठी सी गाली, कहीं व्यंग्य की फुहारें हैं,
यह हास-परिहास की मस्ती, खुशियों की बौछारें हैं।
मिट गए ऊंच-नीच के भेद, और मिट गई सब दूरी,
गले मिले अनजाने भी, अब रही न कोई मजबूरी।
आज प्रेम की इक भाषा है, और रंग है बस एक समान,
यही तो है मेरे भारत की, समरसता का वरदान।
अंतर्मन की बुराई जले, ज्यों 'होलिका' की अग्नि प्रचंड,
प्रह्लाद-भक्ति सी आस्था हो, सत्य का तेज हो अखंड।
स्वच्छ करें हम वातावरण, औषधीय रंगों के मेल से,
तप्त धरा को नव-जीवन दें, फागुन के इस खेल से।
> इस होली, आपके जीवन में खुशियों के चटख रंग घुलें, द्वेष की अग्नि शांत हो और प्रेम की मादकता आपके मन को सदैव प्रफुल्लित रखे।
> आपको और आपके पूरे परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं!
> शशि शेखर

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