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परमात्मा को खोया कब था? मिलता कैसे है?खोया कब? हम परमात्मा में ही खड़े हैं।


परमात्मा कहीं बाहर नहीं। फर्क केवल नामों और साधनों का है। हमने “दूसरे” की एक परत अपने ऊपर चढ़ा रखी है — और उसी को दूरी समझ लिया।मिलता कैसे?
परमात्मा पाने का उपाय नहीं। हर उपाय एक और परत बन सकता है। सत्य यह है — परतों का गिर जाना ही परमात्मा मिलना है।
जन्म से परतें: नग्नता से विकास का भ्रमजन्म के समय: मनुष्य नग्न होता है — न कोई नाम, न धर्म, न अहंकार, न पद, न पहचान। केवल शुद्ध अस्तित्व।धीरे-धीरे परतें चढ़ती हैं: नाम, संबंध, उपलब्धियाँ, धन, मान-अपमान, विचार।दुनिया का भ्रम: इन परतों को “विकास” कहती है।
इन्हीं पर चढ़ना परमात्मा की प्राप्ति समझती है।सत्य उल्टा है: एक सीमा तक साधन ठीक — जब तक भीतर परिपक्वता न आए। लेकिन भीतर की मूर्ति बन जाए, तो परदे हटाने पड़ते हैं।
धर्म: साधन-शक्ति या परत?
धर्म व्यक्ति की साधन-शक्ति है?
हाँ, जब तक भीतर विकास न हो। ये सहारे ठीक हैं।लेकिन अंत में: ज्ञान भी परत है। धर्म भी परत। भगवान का विचार भी परत। जो ईश्वर में खड़ा हो जाए, उसे नाम, संस्था या प्रमाण संस्था भगवान की ज़रूरत नहीं। वह होना ही पूर्ण है।
संन्यास: सब परतें उतारना महावीर का उदाहरण: सब उतार दिया — राजा, धन, साधन, मान। नग्नता शरीर की नहीं, पहचान की थी। सब उतर गया, तो वही शेष रहा जो जन्म के समय था।संन्यास का अर्थ: तेरा-मेरा, नाम-धर्म, अहंकार — सब उतार देना।परिणाम: सारे परदे हटें, तो शिशु-सी निष्कलुष उपस्थिति बचती है। वही आनंद, समाधि, बोध।
जाग्रत पुरुषों की अभिव्यक्तिप्रत्येक अलग संकेत देता है: किसी की नग्नता, किसी की भिक्षा-पात्र।भिक्षा-पात्र का संदेश: “मेरे पास रखने योग्य कुछ नहीं।” केवल ऊर्जा, केवल अस्तित्व।अंतिम परत उतरे: जो शेष रहता है — उसी को ईश्वर कहते हैं।
मुख्य संदेश: परमात्मा मिलना नहीं, परतों का गिर जाना है।

𝙑𝙚𝙙𝙖𝙣𝙩𝙖 2.0 𝙇𝙞𝙛𝙚 = 𝙉𝙤 𝙗𝙚𝙡𝙞𝙚𝙛𝙨 𝙩𝙤 𝙝𝙤𝙡𝙙, 𝙣𝙤 𝙙𝙤𝙘𝙩𝙧𝙞𝙣𝙚𝙨 𝙩𝙤 𝙙𝙚𝙛𝙚𝙣𝙙, 𝙤𝙣𝙡𝙮 𝙩𝙧𝙪𝙩𝙝 𝙩𝙤 𝙡𝙞𝙫𝙚.
अज्ञात अज्ञानी

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