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बिहार की पटना जिलों की अधिकांश बस्तियां की युवा शराबबंदी के बाद सुखी नशे की ओर बढ़ते जा रहे हैं

बिहार के पटना जिले की अधिकांश बस्तियों में इन दिनों एक गंभीर सामाजिक समस्या उभरकर सामने आ रही है। शराबबंदी लागू होने के बाद जहाँ एक ओर अवैध शराब पर रोक लगाने की कोशिश की गई, वहीं दूसरी ओर कई युवा “सुखी नशे” की ओर तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। सुखी नशे से तात्पर्य उन नशीले पदार्थों से है जिन्हें सूंघकर या धूम्रपान के रूप में लिया जाता है, जैसे व्हाइटनर, सॉल्यूशन, गांजा, टैबलेट या अन्य रासायनिक पदार्थ।
गरीब और मजदूर वर्ग के परिवारों के युवाओं में यह प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है। आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, शिक्षा की कमी और सही मार्गदर्शन का अभाव उन्हें इस दलदल की ओर धकेल रहा है। पहले जो युवा शराब का सेवन करते थे, वे अब सस्ते और आसानी से उपलब्ध सुखी नशे की ओर मुड़ रहे हैं। यह नशा कम कीमत में मिल जाता है और छिपकर करना भी आसान होता है, इसलिए इसकी लत तेजी से फैल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सुखी नशे का प्रभाव दिमाग और शरीर दोनों पर बेहद खतरनाक होता है। इससे मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है, याददाश्त कमजोर होती है और कई बार हिंसक प्रवृत्ति भी बढ़ जाती है। परिवारों में कलह, चोरी-चकारी और अपराध की घटनाएँ भी बढ़ने की आशंका रहती है।
स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों के लिए यह एक चुनौती बनता जा रहा है। जरूरत है कि बस्तियों में जागरूकता अभियान चलाए जाएँ, युवाओं के लिए रोजगार और खेल-कूद की सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ तथा स्कूल-कॉलेज स्तर पर नशा मुक्ति कार्यक्रमों को प्रभावी बनाया जाए।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और विकराल रूप ले सकती है।

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