logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

UP पुलिस DSP सौम्या अस्थाना का तुगलकी फरमान थानों के अंदर वीडियों रिकॉर्ड करने पर होगा मुकदमा दर्ज हाई कोर्ट के आदेश नहीं जानती हैं UP पुलिस

कानून बनाम तुगलकी फरमान? ⚖️

UP पुलिस की DSP सौम्या अस्थाना के कथित आदेश को लेकर जो प्रश्न खड़ा हुआ है, वह मात्र प्रशासनिक अनुशासन का नहीं — संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न है 👇

“मेरे किसी भी थाने के अंदर अगर पत्रकार ने वीडियोग्राफी की, तो तुरंत मुकदमा दर्ज होगा!”

वाह! क्या बात है।
संविधान अब विभागीय व्हाट्सऐप ग्रुप से संचालित होगा?
या भारतीय दंड संहिता की नई धारा — ‘अधिकारी अप्रसन्नता अधिनियम’ — मौखिक रूप से लागू कर दी गई है?

❓ लेकिन मूल प्रश्न यह है — क्या ऐसा फरमान विधि से ऊपर है, या विधि अब फरमान की दासी बन चुकी है?

📜 कानूनी हकीकत (Legal Position):

🔹 अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Press Freedom का मूल आधार)
यह अधिकार किसी अफ़सर की अनुमति से प्रदत्त सुविधा नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है।

🔹 पत्रकार कोई अपराधी नहीं — वे सार्वजनिक हित में सूचना संकलन करते हैं।
कैमरा हथियार नहीं होता; वह लोकतंत्र का दर्पण होता है।

🔹 थाना एक सार्वजनिक स्थान है, कोई निजी जागीर या पारिवारिक बैठकखाना नहीं।
यह राज्य की संपत्ति है, और राज्य जनता का है — न कि पदासीन अधिकारी का।

🔹 सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि
👉 प्रेस को बिना वैध, विधिसम्मत और कारणयुक्त आधार के नहीं रोका जा सकता।

🚫 बिना विधिक प्रावधान उद्धृत किए केवल “आदेश” देना — प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि निरंकुश प्रवृत्ति का सूचक है।

⚠️ FIR तभी दर्ज हो सकती है जब विधि में स्पष्ट अपराध का उल्लेख हो।
“वीडियोग्राफी” स्वयं में कोई दंडनीय अपराध नहीं है, जब तक कि वह विधिसम्मत सीमाओं का उल्लंघन न करे।

📢 प्रश्न केवल पत्रकारों का नहीं है।
आज कैमरा रोका गया है,
कल कलम रोकी जाएगी,
परसों प्रश्न पूछना भी “अवमानना” घोषित कर दिया जाएगा।

✊ कानून का राज (Rule of Law) फरमान से नहीं, संविधान से चलता है।
लोकतंत्र में पद प्रतिष्ठा से बड़ा है — परंतु संविधान सर्वोपरि है।

📰📹 पत्रकार का कैमरा अपराध नहीं है!
कानून से ऊपर कोई नहीं — न वर्दी, न पद ⚖️

अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान ने दी है,
किसी अफ़सर के मौखिक आदेश ने नहीं 🇮🇳

मैं स्वयं पूर्व में पत्रकार रहा हूँ और वर्तमान में अधिवक्ता हूँ।
इसलिए न तो प्रेस की संवेदनशीलता से अपरिचित हूँ, न विधि की सीमाओं से।

यदि उक्त कथन सत्य है, तो यह स्पष्ट किया जाए —
किस विधिक प्रावधान के अंतर्गत पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी दी गई?
किस अधिनियम की कौन-सी धारा के आधार पर?
क्या कोई लिखित आदेश पारित हुआ है?

अन्यथा यह मानने में संकोच नहीं होगा कि यह कथन विधिक आधारहीन, असंवैधानिक एवं दमनात्मक प्रकृति का है।

क्योंकि लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं, अधिकार है।

आनन्द कुमार त्रिपाठी

55
2730 views

Comment