धर्म सत्ता और सिंहासन
धर्म, सत्ता और सिंहासन: ज्योतिषपीठ के 'शंकराचार्य' पद का गहराता विवाद
प्रयागराज की पावन धरती पर मौनी अमावस्या के दिन जो हुआ, उसने न केवल प्रशासन और संत समाज के बीच की खाई को उजागर किया, बल्कि एक पुराने कानूनी और आध्यात्मिक युद्ध को भी फिर से हवा दे दी है। आखिर कौन है ज्योतिषपीठ का असली उत्तराधिकारी?
विवाद की जड़: आस्था या अधिकार?
हाल ही में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम घाट पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुलिस प्रशासन के बीच हुई तीखी झड़प ने सुर्खियां बटोरीं। गंगा स्नान से रोके जाने के बाद जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे, तो प्रशासन ने उनके 'शंकराचार्य' पद के दावे पर ही स्पष्टीकरण मांग लिया। यह कदम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि उस कानूनी लड़ाई का हिस्सा है जो दशकों से न्यायालय की गलियारों में भटक रही है।
कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?
प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुर गांव में जन्मे उमाशंकर उपाध्याय (अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) का सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर दंड सन्यास तक पहुंचा है। वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रहे उमाशंकर को 2003 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 'दंड दीक्षा' देकर नया नाम और पहचान दी। स्वामी स्वरूपानंद के ब्रह्मलीन होने के बाद 12 सितंबर 2022 को उनका पट्टाभिषेक हुआ, लेकिन यहीं से विवादों का नया अध्याय शुरू हो गया।
अदालती पेच और सुप्रीम कोर्ट की रोक
यह मामला जितना आध्यात्मिक है, उतना ही कानूनी भी।
• रोक का आदेश: अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर अंतरिम रोक लगा दी थी। जस्टिस बी.आर. गवई और बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने यह फैसला सॉलिसिटर जनरल के उस तर्क के बाद लिया, जिसमें कहा गया था कि पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य ने इस नियुक्ति का समर्थन नहीं किया है।
• विपक्षी दावा: स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती इस दावे को चुनौती देते रहे हैं। उनके अनुसार, वे ही परंपरा सम्मत उत्तराधिकारी हैं।
ज्योतिषपीठ की जो परंपरा है, उससे मैं शंकराचार्य हूं। शंकराचार्य स्वयं अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं और स्वामी विष्णुदेवानंद ने मुझे नियुक्त किया है।"
— स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती
त्रिकोणीय संघर्ष: दावों की हकीकत
विवाद केवल दो पक्षों के बीच नहीं है। पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का रुख इस मामले में अत्यंत कड़ा है। वे 'फर्जी शंकराचार्यों' के खिलाफ सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग करते आए हैं। उनका मानना है कि आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों की मर्यादा के साथ खिलवाड़ 'देशद्रोह' के समान है।
मर्यादा पर प्रश्नचिह्न
शंकराचार्य का पद सनातन धर्म में सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता का प्रतीक है। जब यह पद अदालतों, पुलिस नोटिसों और छात्र राजनीति के अतीत वाले विवादों में घिरता है, तो सामान्य श्रद्धालु के मन में संशय पैदा होता है। ज्योतिषपीठ का यह सिंहासन वर्तमान में दो दावेदारों और अनगिनत कानूनी फाइलों के बीच झूल रहा है।
जनता सब देख रही है, लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या इस विवाद का अंत आध्यात्मिक संवाद से होगा या फिर देश की सर्वोच्च अदालत ही तय करेगी कि सनातन का 'ध्वजवाहक' कौन होगा?
योगी बनाम मौर्य: एक विवाद, दो सुर
प्रयागराज में पुलिस और संतों के बीच हुई झड़प के बाद सरकार के दो सबसे बड़े चेहरों के बयान बिल्कुल अलग नजर आ रहे हैं। जहाँ सीएम योगी ने कड़ा रुख अपनाया है, वहीं केशव मौर्य ने संतों के प्रति नरमी दिखाई है।
1. सीएम योगी का 'कड़ा' प्रहार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने बयानों में 'कालनेमी' शब्द का जिक्र कर कड़ा संदेश दिया।
• मायने: रामायण में 'कालनेमी' वह राक्षस था जिसने साधु का वेश धरकर हनुमान जी को रोकने की कोशिश की थी।
• सीएम के इस तंज का सीधा मतलब यह निकाला जा रहा है कि वे धर्म की आड़ में राजनीति करने वालों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। योगी आदित्यनाथ खुद एक पीठ के महंत हैं, इसलिए वे अपनी 'कठोर छवि' और अनुशासन से समझौता नहीं करना चाहते।
2. केशव प्रसाद मौर्य का 'नरम' रुख
दूसरी ओर, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने संतों के प्रति बहुत ही सम्मानजनक और 'सॉफ्ट' भाषा का इस्तेमाल किया।
• मायने: मौर्य ने कहा कि संतों का अपमान नहीं होना चाहिए और मामला बातचीत से सुलझना चाहिए।
• वे प्रयागराज के स्थानीय नेता भी हैं और उनके लिए संतों की नाराजगी भारी पड़ सकती है। इसलिए उन्होंने खुद को संतों के हितैषी के रूप में पेश किया।
इस 'अलग सुर' के क्या मायने हैं?
राजनीतिक गलियारों में इसके दो प्रमुख मायने निकाले जा रहे हैं:
• रणनीति (Good Cop, Bad Cop): हो सकता है यह एक सोची-समझी चाल हो। मुख्यमंत्री प्रशासन को मजबूत रख रहे हैं ताकि कोई कानून-व्यवस्था न बिगाड़ सके, जबकि डिप्टी सीएम नाराज संतों को मनाने और डैमेज कंट्रोल का काम कर रहे हैं।
• राजनीतिक समीकरण: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं। योगी उन्हें एक राजनीतिक विरोधी की तरह देख रहे हैं, जबकि मौर्य इसे एक बड़े 'वोट बैंक' (हिंदू समाज और संत वर्ग) की नाराजगी के तौर पर देख रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ: देश के नंबर 1 मुख्यमंत्री, यूपी बना विकास का मॉडल
साल 2025 में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जलवा कायम है। हाल ही में आए 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) के आंकड़ों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोकप्रियता के मामले में योगी जी का कोई मुकाबला नहीं है। वे लगातार रिकॉर्ड बनाते हुए देश के सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बने हुए हैं।
लोकप्रियता में सबसे आगे (रैंकिंग 2025)
ताजा सर्वे के अनुसार, देश की जनता ने योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली पसंद माना है। अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तुलना में उनका ग्राफ काफी ऊंचा है:
क्यों हैं योगी जी No. 1?
योगी आदित्यनाथ की इस सफलता के पीछे तीन मुख्य स्तंभ हैं: विकास, सुरक्षा और सुशासन।
• सुरक्षा और कानून-व्यवस्था: 'यूपी मॉडल' आज पूरे देश में चर्चा का विषय है। अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जीरो टॉलरेंस की नीति ने जनता के बीच सुरक्षा का अटूट भरोसा पैदा किया है।
• बदलता बुनियादी ढांचा: आज उत्तर प्रदेश 'एक्सप्रेसवे प्रदेश' के रूप में जाना जा रहा है। बेहतर सड़कें, नए हवाई अड्डे और बेहतर बिजली व्यवस्था ने यूपी की तस्वीर बदल दी है।
• बीमारू से 'ग्रोथ इंजन' तक: कभी पिछड़ा माने जाने वाला उत्तर प्रदेश आज भारत की अर्थव्यवस्था का 'ग्रोथ इंजन' बन चुका है। निवेश के मामले में यूपी अब बड़े-बड़े राज्यों को पीछे छोड़ रहा है।
सुशासन का 8 साल का सफर
हाल ही में योगी सरकार ने अपने कार्यकाल के 8 वर्ष पूरे किए हैं। इस दौरान सरकार ने न केवल माफिया राज को खत्म किया, बल्कि गरीबों के लिए घर, युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। जनता का यही भरोसा उन्हें बार-बार नंबर 1 की कुर्सी पर बैठा रहा है।
उत्तर प्रदेश अब अपनी पुरानी पहचान छोड़ चुका है। आज का यूपी सुशासन और समृद्धि का नया केंद्र है।"
आभार
गौतम कुमार सिंह