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होलिका दहन की हार्दिक शुभकामनाएं नैतिक आध्यात्मिक गुना का समावेश करते भारतीय संस्कृति शिक्षा में पर्वों का महत्व: कृष्ण कुमार पाठक

प्राचीन भारत में शिक्षा केवल सूचना संग्रह नहीं बल्कि जीवन जीने की कला थी।
तक्षशिला और गोकुल परंपरा यहां शिक्षा स्वायत्त थी राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम और गुरु का स्थान सर्वोपर था। अनुशासन और नैतिकता और व्यावहारिक (64 कलाएं) शिक्षा के मूल आधार थे।
यूजीसी और वर्तमान विसंगत वर्तमान में यूजीसी जैसे संस्थाए प्रशासनिक जटिलताओं और डिग्री केंद्रित व्यवस्था में उलझ गए हैं। जहां तक्षशिला विश्व को ज्ञान बांट था आज हमारी व्यवस्था का ब्रेन ट्रेन (प्रतिभा पलायन) की चुनौती झेल रही है।
विधायिका की भूमिका - नीतिगत विषमता और सुधारात्मक कदम-
विधायिका का प्रमुख दायित्व समाज की बदलता जरूर के अनुसार नीतियों का निर्माण करना है नीतिगत विषमता अवसर देखा गया है कि शैक्षिक नीतियां जमीनी हकीकत जैसे ग्रामीण बुनियादी ढांचा से दूर होती है आरक्षण और प्रवेश परीक्षाओं जैसे (NEET/NET) को लेकर होने वाले विवाद विधायिका की त्वरित और संवेदनशील निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।
संवैधानिक पहल विधायिका को अनुच्छेद 21 ए शिक्षा का अधिकार को लेकर प्राथमिक शिक्षा तक सीमित न रहकर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और समानता के साथ जोड़ना होगा। सामाजिक न्याय केवल संख्यात्मक आरक्षण नहीं बल्कि गुणात्मक (समान अवसर) होना चाहिए।
न्यायपालिका जनहित और संवैधानिक अधिकारों की रक्षक जब विधायिका या प्रशासनिक संस्थाएं जैसे यूजीसी अपने मार्ग से भटकती है तब न्यायपालिका एक सशक्त मिसाल पेश करती है।
सामाजिक न्याय का संतुलन न्यायपालिका के बार-बार स्पष्ट किया है कि आरक्षण और योग्यता एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। यह सभी वर्गों को समानता लाने हेतु आर्थिक रूप से लागू किया जाना ही संवैधानिक अधिकारों के महत्व को प्रभावित करती हैं।
प्रज्ञा क्या पुनर्जागरण तक्षशिला की विरासत और संवैधानिक चेतना
भारतीय राष्ट्रवाद केवल एक राजनीतिक सीमा नहीं बल्कि हजारों वर्ष की मस्तिष्क चेतना का प्रतिफल है।
आज के आधुनिक युग में जब हम राष्ट्रीय है कि कारण की बात करते हैं तो हमें प्राचीन तक्षशिला विश्वविद्यालय के उसे नेतृत्वकारी डिस्ट और आधुनिक संवैधानिक अधिकारों के मध्य एक सेतु बनाना होगा।
संवैधानिक गर्मियों और अनुच्छेद 21 का विस्तार भारत का संविधान केवल कानून का संग्रह नहीं बल्कि मानवीय आदर्श संवेदना का जीवंत स्वरूप है अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता इसका हृदय है।
जीवन का अर्थ केवल सांस लेना नहीं बल्कि शिक्षा स्वास्थ्य और गरिमा के साथ जीना है या विधायिका के उसे उद्देश्य को पूर्ण करता है जहां सामान्य केवल कागजी नहीं बल्कि शैक्षिक संस्थानों में प्रतिभा व्युत्पत्ति का आधार बनती है।
तक्षशिला से विधिक साक्षरता का एक वैचारिक यात्रा
तक्षशिला का नेतृत्व केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि समाज में ज्ञान ज्योति प्रज्ज्वलित करने के लिए था। आचार्य चाणक्य ने सिखाया की वैज्ञानिक दृष्टिकोण और श्रुति स्मृति आधारित ज्ञान का संतुलन ही राष्ट्र को अजय बनता है।
भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान वही है जो व्यक्ति अपनी संस्कृति साहित्य से जुड़े रखते हुए आधुनिकता के पद पर अग्रसर रहे।
गरिमा पुण्य जीवन विधायिका का उद्देश्य सदैव ऐसे कानून का निर्माण करना रहा है जो सामाजिक समानता सुनिश्चित करें हालांकि संशोधनों के माध्यम से जब अधिकारों का विस्तार हुआ तो इसमें शिक्षा 86वां संशोधन और स्वास्थ्य जैसे आयाम जुड़े।
शैक्षिक संस्थानों में समानता का अर्थ केवल अवसर की उपलब्धता नहीं बल्कि उसे बौद्धिक न्याय से है जहां पर हर व्यक्ति अपनी प्रतिभा और अभ्यास से अपना स्थान बना सके।
मस्तिष्क चेतना में आध्यात्मिक ऊर्जा और तर्क संगत सोच का मिलन होता है तब प्रतिभा व्युत्पत्ति और निरंतर अभ्यास से समाज का सर्वांगीण विकास संभव है। हमारे मौलिक कर्तव्य हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का आदेश देते हैं जो तक्षशिला के तर्क और भारतीय साहित्य की संवेदना का ही आधुनिक रूप है तक्षशिला का आदर्श प्राचीन वही संवैधानिक प्रावधान का तुलनात्मक अध्ययन ज्ञान सूरत स्मृति आधारित प्रज्ञा है।
कुल मिलाकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपरोक्त विचारों का तुलनात्मक अध्ययन विकसित भारत की परिकल्पना की ओर अग्रसर होने में महत्वपूर्ण विचारों को आत्मसात करते हैं नागरिक कर्तव्य उत्तरदायित्व के निर्वहन के लोकतंत्रात्मक शासन का मूल आधार है कहना अन्यथा ना होगा।
कृष्ण कुमार पाठक
लेखक/पत्रकार

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