logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

बीएचयू सिंहद्वार के पास सजी इको-फ्रेंडली होलिका, काशी में परंपरा संग पर्यावरण का संदेश




वाराणसी। रंगों के पर्व होली से पूर्व काशी में तैयारियां जोरों पर हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सिंहद्वार के पास होलिका सज चुकी है। इस वर्ष भी शहर में इको-फ्रेंडली होलिका बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अधिकांश स्थानों पर लकड़ी और उपलों से पारंपरिक ढंग से होलिका सजाई गई है, जिसमें प्लास्टिक या अन्य हानिकारक सामग्री का प्रयोग नहीं किया जा रहा है।

होलिका दहन हिंदू धर्म का अत्यंत प्राचीन और आस्था से जुड़ा पर्व है। इसे बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और सत्य की शक्ति ने अहंकार और अत्याचार का अंत किया था। इसी संदेश को जीवंत रखने के लिए कई स्थानों पर होलिका के साथ भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।



तीन-चार दिन पहले से शुरू हो जाती है तैयारी
काशी में लोग होलिका दहन की तैयारी तीन-चार दिन पहले से ही प्रारंभ कर देते हैं। मोहल्लों में युवाओं और स्थानीय समितियों द्वारा साफ-सफाई, सजावट और लकड़ी-उपलों की व्यवस्था की जाती है। इस बार पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अधिकतर स्थानों पर सीमित और नियंत्रित सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, ताकि प्रदूषण कम हो और हरियाली को नुकसान न पहुंचे।



शहर के प्रमुख स्थानों पर सजी होलिका
शहर के लंका, अस्सी घाट, अस्सी चौराहा, भदैनी, रथयात्रा, कमच्छा सहित विभिन्न इलाकों में इको-फ्रेंडली होलिका सजाई गई है। स्थानीय निवासियों में इसको लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस पर्व की तैयारियों में जुटे हैं।

परंपरा और जागरुकता का संगम
इस बार काशी में होलिका दहन केवल परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहा है। आयोजकों का कहना है कि कम धुएं और प्राकृतिक सामग्री से होलिका जलाकर हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। रंगों और उमंग के इस पर्व को लेकर शहर में उत्साह का माहौल है। होलिका दहन के साथ ही काशी में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाएगी और पूरा शहर हर्ष और उल्लास में डूब जाएगा।

13
200 views

Comment