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धर्म-ध्वजा फहराती नभ में, जली-होलिका पाप की

प्रदीप
छंदाधारित गीत
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दानव-दल को व्याकुल करती,
प्रबल-ताप हरि जाप की।
धर्म-ध्वजा फहराती नभ में,
जली-होलिका पाप की।।
1-
धर्म-सूर्य का उदय-हुआ है,
टली-कालिमा रात की।
जली-दैत्य की कंचन लंका,
त्रेता-युग की बात है।।
हार नहीं मन-माने रण में,
विजय-अटल है आपकी।
धर्म-ध्वजा--------------
2-
चिता-पाप की जलती देखी,
द्वापर-युग में नैन से।
घायल होते देखा रण-में,
शूरवीर-को बैन से।।
बनते देखा शीतल-वर को,
तीखी-पावक शाप की।।
धर्म-ध्वजा-------------
3-
काट-रहा है कलयुग में भी,
धर्म-पाप की डाल को।
दिखा विश्व में भानु दमकता,
भारत माँ के लाल को।।
धर्म-कर्म से शीतल होती,
तीव्र-ताप संताप की।
धर्म-ध्वजा-----------------
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प्रभुपग धूल



























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