लोकतंत्र की लक्ष्मणरेखा : आलोचना, सुधार और संवैधानिक मर्यादा ।
"सत्य को कहना अगर बगावत है, तो समझो हम भी बागी हैं,
मगर राष्ट्र की मर्यादा न टूटे, यही सच्ची देश-अनुरागी है।"
भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में "न्यायपालिका" वह गर्भगृह है, जहाँ आम आदमी अटूट विश्वास के साथ अपनी फरियाद लेकर जाता है। हाल ही में NCERT की आठवीं कक्षा की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े अध्याय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी प्रतिक्रिया ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। कोर्ट का यह मानना कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने की एक 'सुनियोजित साजिश' हो सकती है, संस्थान की गरिमा की रक्षा के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी संवैधानिक संस्था की छवि को धूमिल करना राष्ट्र के गौरव को चोट पहुँचाने जैसा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान कि सरकार की मंशा छवि खराब करने की नहीं थी, इस बात की पुष्टि करता है कि जवाबदेही तय होना अनिवार्य है। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू भी कम चिंतनीय नहीं है। जब समाचारों में जजों के पास से रिश्वत की खबरें या भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, तो आम जनमानस का भरोसा डगमगाता है।
"जब नाव जल में होती है, तो वह चलती है, पर जब जल नाव में आ जाता है, तो वह डूबने लगती है।"
यही स्थिति हमारी संस्थाओं की है। व्यवस्था में कमियाँ हो सकती हैं, पर उन कमियों का समाधान 'संस्था को बदनाम' करके नहीं, बल्कि "संस्था के शुद्धिकरण" से होना चाहिए।
आज केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि समाज का 'चौथा स्तंभ' कहा जाने वाला मीडिया भी TRP की अंधी दौड़ में अपनी प्रामाणिकता खो रहा है। एक स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है कि:
- प्रबुद्ध वर्ग आगे आए:-देश के बुद्धिजीवियों को एक सकारात्मक जन-जागरण छेड़ना होगा।
- सत्यनिष्ठा का पालन:-चाहे लेखक हों, पत्रकार हों या नीति-निर्माता, राष्ट्र की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए।
- पारदर्शिता:-संस्थाओं के भीतर की गंदगी को साफ करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में किसी को उंगली उठाने का मौका न मिले।
देश की गरिमा को बचाना केवल अदालतों या मंत्रियों का काम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का दायित्व है। हमें आलोचना और अपमान के बीच की महीन रेखा को समझना होगा। सुधार की गुंजाइश हमेशा होती है, लेकिन सुधार का मार्ग "विनाश" नहीं "विकास" होना चाहिए।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT