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पटना में चौकीदार-दफादार: मुख्य विवाद और मांगें l


1. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और आश्रितों की बहाली (सबसे बड़ा पेंच)
​सबसे बड़ा विवाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) को लेकर है। पहले नियम था कि अगर कोई चौकीदार रिटायर होने से पहले अपने किसी आश्रित (बेटे/बेटी) को नामांकित करता था, तो उसे नौकरी मिल जाती थी।
​विवाद: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद सरकार ने इसे 'बैकडोर एंट्री' मानकर रोक लगा दी थी।
​ताजा स्थिति: चौकीदार संघ मांग कर रहा है कि 5 मार्च 2014 के पूर्व के नियमों को बहाल किया जाए और जिन आश्रितों की बहाली रुकी हुई है, उन्हें तुरंत जॉइनिंग दी जाए।

​2. 'थाना हाजिरी' और बेगारी का मुद्दा
​पटना के अलग-अलग थानों में चौकीदारों का आरोप है कि उनसे पुलिसिया काम के बजाय थानों में निजी काम (जैसे खाना बनवाना, बर्तन धुलवाना या अफसरों की सेवा) करवाया जाता है।
​मांग: वे मांग कर रहे हैं कि उनकी ड्यूटी केवल उनके बीट (गांव) में लगाई जाए और उन्हें थानों में 'कैदी' की तरह न रखा जाए।

​3. 'राज्य कर्मी' का दर्जा और वेतन विसंगति
​कहने को तो ये सरकारी सेवक हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर अब भी संघर्ष जारी है।
​मांग: इन्हें 'राज्य कर्मी' का पूर्ण दर्जा और अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह एसीपी (ACP) और एमएसीपी (MACP) का लाभ चाहिए। साथ ही, वेतन मान में सुधार की मांग भी प्रमुख है।

​4. वर्दी और भत्ता
​चौकीदारों का कहना है कि उन्हें सालों से न तो नई वर्दी मिली है और न ही साइकिल या अन्य जरूरी उपकरण। वे पुराने भत्तों (Allowances) पर ही काम कर रहे हैं।

अधिकारियों का कहना होता है कि "नियम बदल गए हैं", जबकि चौकीदारों का तर्क है कि "हमारी सेवा की प्रकृति अलग है, इसलिए हमारे नियम भी अलग होने चाहिए।"

news is courtesy of Sunny Sharma

Sushant Kumar Khan
Executive Member of All India Media
Association and Social Media Activist.

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