सारंगढ़ मे भ्रष्टाचार का ‘रीवापार मॉडल’…बिना दुकान के ही कट गए लाखों के GST बिल..!कागजों में चमक रहा विकास, जमीन पर सन्नाटा?
रिपोर्ट- सुनील कुमार पुरैना
भटगांव/ सारंगढ़। छत्तीसगढ़ की सरकार ने पंचायतों की सूरत बदलने के लिए 15वें वित्त आयोग का खजाना खोला था, लेकिन सारंगढ़ जनपद के ग्राम पंचायत रीवापार में इस खजाने पर ‘भ्रष्टाचार के दीमकों’ ने धावा बोल दिया है। यहाँ सरपंच और सचिव की जुगलबंदी ने विकास की ऐसी इबारत लिखी है, जिसमें ईंट-पत्थर की जगह सिर्फ फर्जी बिलों का इस्तेमाल हुआ है।
रीवापार पंचायत में सरकारी नियमों को ठेंगे पर रखकर टाईट और अनटाईट फंड की बंदरबांट की गई है। नियम कहते हैं कि भुगतान केवल उन्हीं फर्मों को होगा जिनके पास वैध GST नंबर हो। लेकिन यहाँ तो खेल ही निराला है, जैसे –जिन फर्मों के नाम पर लाखों के बिल लगाए गए, धरातल पर उनका अस्तित्व ही नहीं है।
कमीशन का खेल: ट्रेडर्स सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत कमीशन लेकर फर्जी GST बिल थमा रहे हैं। न कोई ईंट खरीदी गई, न सीमेंट, बस कागजी घोड़े दौड़ाकर सरकारी राशि डकार ली गई।
शून्य विकास-
जब सामग्री ही नहीं खरीदी गई, तो काम कहाँ से होगा? नतीजा ग्रामीण आज भी नालियों और साफ पानी के लिए तरस रहे हैं।
ग्रामीणों का कथन –
”सामान खरीदा होता तो असली दुकान का बिल होता। यहाँ तो सिर्फ रद्दी कागज के टुकड़ों पर शासन की तिजोरी साफ कर दी गई।”
सरपंच पति का कुबूलनामा या बचाव?
जब इस फर्जीवाड़े की परतें खुलीं, तो सरपंच पति ने बड़े ही बेबाक अंदाज में सफाई दी कि “बिल-वाउचर लगे हैं और वह ग्राम डंगनिया का ही है।” सवाल यह है कि क्या सिर्फ कागज पर बिल होने से भ्रष्टाचार वैध हो जाता है? क्या डंगनिया में वह जादुई दुकान मौजूद है जो बिना सामान रखे लाखों का ट्रांजैक्शन कर रही है?
साहबों की ‘मौन’ सहमति बना भ्रष्टाचार का ढाल?
सारंगढ़ जनपद में यह कोई पहला मामला नहीं है। शिकायतों का अंबार लगा है, लेकिन अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं।
क्या जनपद के उच्च अधिकारियों को इस ‘बिलिंग सिंडिकेट’ की जानकारी नहीं है?
या फिर ‘ऊपर तक’ हिस्सा पहुँचने की वजह से कार्यवाही की फाइलें दबी हुई हैं?
बिना भौतिक सत्यापन के फर्जी बिलों पर राशि का आहरण होना सीधे तौर पर जनपद के तकनीकी और प्रशासनिक अमले की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।