*पत्रकारिता की विश्वसनीयता दांव पर है**
**पत्रकारिता की विश्वसनीयता दांव पर है**
**लेखक: हरिशंकर पाराशर**
आज के डिजिटल युग में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है, लेकिन दुर्भाग्य से यह स्तंभ खुद अपनी नींव हिलता हुआ महसूस कर रहा है। विश्वसनीयता का संकट भारतीय मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। जहां एक ओर सूचना का प्रवाह पहले से कहीं अधिक तेज और व्यापक हो गया है, वहीं दूसरी ओर खबरों की सत्यता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। क्या पत्रकारिता अब मात्र सूचना देने का माध्यम रह गई है, या यह विश्वास की संस्था बनकर रह गई है?
पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संकट के कई कारण हैं। सबसे प्रमुख है राजनीतिक प्रभाव और 'गोदी मीडिया' की प्रवृत्ति। कई मुख्यधारा के चैनल और अखबार सत्ताधारी दल या बड़े कॉर्पोरेट हितों के अनुरूप खबरें पेश करते दिखते हैं। इससे जनता में यह धारणा मजबूत हुई है कि मीडिया अब सच्चाई का आईना नहीं, बल्कि प्रचार का साधन बन गया है। हाल के वर्षों में कई घटनाओं—चाहे वह चुनावी कवरेज हो, सामाजिक मुद्दे हों या अंतरराष्ट्रीय मामले—में पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग ने इस संदेह को और गहरा किया है।
दूसरा बड़ा कारण है फेक न्यूज और सोशल मीडिया का उदय। व्हाट्सएप, फेसबुक, एक्स जैसी प्लेटफॉर्म्स पर अफवाहें और गलत सूचनाएं प्रकाश की गति से फैलती हैं। मुख्यधारा मीडिया भी कई बार इनकी पुष्टि किए बिना उन्हें उठा लेता है, जिससे उसकी साख को ठेस पहुंचती है। एडेलमैन ट्रस्ट बारोमीटर जैसे सर्वेक्षणों में भारत में मीडिया पर विश्वास का स्तर वैश्विक औसत से बेहतर दिखता है (2026 के आंकड़ों में भारत उच्च विश्वास वाले देशों में शीर्ष पर रहा), लेकिन यह आंकड़ा मुख्य रूप से व्यवसाय और सरकार के साथ जुड़ा है; मीडिया विशेष रूप से कई वर्गों में अविश्वास का शिकार है। कम आय वर्ग में विश्वास और भी कम है, जबकि उच्च आय वर्ग में अपेक्षाकृत बेहतर।
तीसरा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का बढ़ता प्रभाव। AI अब खबरें लिखने, संपादन करने और यहां तक कि वीडियो जेनरेट करने में इस्तेमाल हो रहा है। अरुण पुरी जैसे वरिष्ठ संपादकों ने भी चेतावनी दी है कि AI खबरों की विश्वसनीयता के लिए खतरा बन सकता है, क्योंकि यह गलत सूचना को और तेजी से फैला सकता है। साथ ही, पत्रकारों की नौकरियां दांव पर हैं, जिससे गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
इस संकट से उबरने के लिए क्या किया जा सकता है? सबसे पहले, पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को फैक्ट-चेकिंग को प्राथमिकता देनी होगी। पारदर्शिता बढ़ानी होगी—स्रोतों का खुलासा, सुधारों की घोषणा और संपादकीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करना। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन जैसे निकायों को और सशक्त बनाना होगा। पत्रकारों को स्व-नियमन (self-regulation) अपनाना होगा, ताकि बाहरी दबाव कम हो।
सच्ची पत्रकारिता वह है जो जनता के हित में खड़ी हो, न कि किसी दल या व्यापारिक हित में। अगर मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो देगा, तो लोकतंत्र की नींव ही कमजोर पड़ जाएगी। समय आ गया है कि पत्रकारिता अपने मूल मिशन—सत्य की खोज—की ओर लौटे। अन्यथा, यह चौथा स्तंभ ढहने के कगार पर पहुंच जाएगा। जनता को सजग रहना होगा, सवाल पूछने होंगे और केवल सत्यापित सूचना पर भरोसा करना होगा।
(लेख प्रकाशन हेतु तैयार। आवश्यकतानुसार संपादन किया जा सकता है।)