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سُن لیے تو سُلجھ گئے مسئلے سُنا دیے تو اُلجھ گئے۔ ”सुन लिए तो सुलझ गए मसले, सुना दिए तो उलझ गए।”


کتنی سادہ سی بات ہے، مگر زندگی کی بہت سی الجھنوں کا حل اسی میں چھپا ہے۔
ہم سب چاہتے ہیں کہ لوگ ہمیں سمجھیں، ہماری بات غور سے سنیں۔ لیکن کیا ہم خود دوسروں کو اتنا ہی سکون اور توجہ دیتے ہیں؟ اکثر ایسا ہوتا ہے کہ سامنے والا بول رہا ہوتا ہے اور ہم دل ہی دل میں اپنا جواب تیار کر رہے ہوتے ہیں۔ بس وہیں سے فاصلے شروع ہو جاتے ہیں۔
بہت سے مسائل اصل میں بڑے نہیں ہوتے، وہ صرف غلط فہمی کا نتیجہ ہوتے ہیں۔ اگر ہم تھوڑا سا رک کر، بغیر ٹوکے، بغیر فیصلہ سنائے کسی کی بات سن لیں تو معاملہ وہیں ٹھنڈا ہو سکتا ہے۔ لیکن جب ہم جلدی میں اپنی بات منوانے لگتے ہیں، صفائیاں دینے لگتے ہیں یا دوسرے کو غلط ثابت کرنے کی کوشش کرتے ہیں تو بات سنبھلنے کے بجائے اور بگڑ جاتی ہے۔
رشتے بحث سے نہیں، سمجھ سے چلتے ہیں۔ گھر ہو، دفتر ہو یا دوستوں کا حلقہ، ہر جگہ انسان صرف یہ چاہتا ہے کہ اس کی بات کو اہمیت دی جائے۔ کبھی کبھی کسی کو صرف سن لینا ہی اس کے دل کا بوجھ ہلکا کر دیتا ہے۔
سننا کمزوری نہیں، بلکہ پختگی کی نشانی ہے۔ یہ اس بات کا ثبوت ہے کہ آپ انا سے زیادہ رشتے کو اہمیت دیتے ہیں۔ بعض اوقات خاموش رہ کر سن لینا، لمبی تقریر کرنے سے زیادہ اثر رکھتا ہے۔
اگر ہم سچ میں چاہتے ہیں کہ مسائل کم ہوں اور دل قریب آئیں تو ہمیں سننے کا حوصلہ پیدا کرنا ہوگا۔ کیونکہ اکثر مسئلے لفظوں سے نہیں، لہجے اور رویے سے جنم لیتے ہیں۔
بات بس اتنی سی ہے،
سن لینا دل جوڑتا ہے، اور سنا دینا دل توڑ دیتا ہے۔


कितनी सीधी सी बात है, लेकिन जिंदगी की आधी परेशानियों का जवाब इसी में छुपा है।
हम सब चाहते हैं कि लोग हमें समझें। हमारी बात ध्यान से सुनें। लेकिन सच पूछिए तो हम खुद कितनी बार किसी की बात पूरी सुनते हैं? अक्सर सामने वाला बोल रहा होता है और हम मन ही मन अपना जवाब तैयार कर रहे होते हैं। बस यहीं से गड़बड़ शुरू होती है।
कई बार मसला बड़ा नहीं होता। बस दो लोगों के बीच एक छोटी सी गलतफहमी होती है। अगर उसी वक्त ठहरकर, बिना टोके, बिना जज किए, हम सामने वाले की बात सुन लें तो मामला वहीं शांत हो सकता है। लेकिन जब हम जल्दी में अपनी बात “सुना” देते हैं, अपनी सफाई देने लगते हैं या सामने वाले को गलत साबित करने लगते हैं, तो बात सुलझने के बजाय और उलझ जाती है।
रिश्ते बहस से नहीं, समझ से चलते हैं। घर में पति पत्नी का झगड़ा हो, दोस्तों के बीच नाराजगी हो या ऑफिस में किसी बात पर तकरार, ज्यादातर मामलों में लोग सुने जाने की उम्मीद रखते हैं। उन्हें समाधान से पहले एहसास चाहिए कि उनकी बात की अहमियत है।
सुनना कमजोरी नहीं है। यह परिपक्वता है। यह बताता है कि आप रिश्ते को अपनी ईगो से ऊपर रखते हैं। कभी कभी चुप रहकर सुन लेना, दस दलील देने से ज्यादा असरदार होता है।
हम सबकी जिंदगी में ऐसे कई मौके आए होंगे जब बस थोड़ा सा धैर्य रखते तो बात बिगड़ती नहीं। इसलिए अगली बार जब कोई नाराज हो, शिकायत करे या अपनी बात रखे, तो तुरंत जवाब देने की बजाय थोड़ा ठहरिए। हो सकता है, सिर्फ सुन लेने से ही आधी समस्या खत्म हो जाए।
आखिर में बात इतनी सी है — सुनना रिश्ते बचाता है, सुनाना अक्सर उन्हें थका देता है।

🖋️मो. जावेद
उपसंपादक राईट हेडलाईन्स नासिक

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