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उम्मीदों का आइना चकनाचूर हो गया, हमारी धरोहर जो हमसे दूर हो गया:- डॉ० प्रभुनाथ गुप्त

लक्ष्मीपुर हमेशा से ही उपेक्षा का शिकार होता रहा है। चाहे वह विधानसभा के रूप में पहचान खोना हो या एशिया का पहला ट्रॉम-वे हो। चावल मण्डी के रूप में और लकड़ी के रूप में लक्ष्मीपुर की एक अलग पहचान रही है। ग्राहकों से भरा रहने वाला बाजार आज अपने अतीत को सोचकर बस...यूँ ही मुस्कुरा कर रह जा रहा है। लगभग सब कुछ खो चुका लक्ष्मीपुर एक सन्नाटे में सकरी गलियों में पसरा एक बाजार जो एक अदद ग्राहकों के रूप में ही रह गया है। टाउन एरिया का मोहताज बन कर रह गया है। जबकि ब्लॉक मुख्यालय, वन विभाग, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, बैंक, इंटर कॉलेज और कई ग्रामसभाओं को जोड़ने वाला लक्ष्मीपुर जो कभी स्थानीय लोगों के दिलों में राज करता था....आज न जाने किसकी राह देख रहा है। एक सपना था कि लक्ष्मीपुर से टेढ़ीघाट और चौक तक एक आनन्द दायी सफर और संग्रहालय के रूप में शीघ्र ही हम सबको अपनी ओर आकर्षित करेगा। ट्रॉम-वे इंजन का छुक-छुक आज कुछ अधिक ही सुनाई दे रहा है। आँखों में आँसू देकर वह इस तरह से जा रहा है जैसे कि वह कुछ कहना चाह रहा हो। बे-बस हम देखकर और चाहकर भी तो कुछ नहीं कर सकते। हमारी वह धरोहर...विरासत...और गौरव।
सही अर्थों में ट्रॉम-वे के इन्जनों को यहाँ से ले जाना मन को व्यथित कर दिया है।

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