आंकड़ों की बाजीगरी या लापरवाही? स्वास्थ्य मेले की वास्तविकता आई सामने
आंकड़ों की बाजीगरी या लापरवाही? स्वास्थ्य मेले की वास्तविकता आई सामने
अयोध्या
धार्मिक पहचान के लिए देशभर में चर्चित अयोध्या इस बार एक स्वास्थ्य मेले को लेकर चर्चा में है।अयोध्या स्थित अवध इंटरनेशनल स्कूल परिसर में रविवार को श्री गोरखनाथ पीठ न्यास और नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय स्वास्थ्य सम्मेलन एवं मेले का आयोजन किया गया। आयोजन के बाद जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने मेले की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।आयोजकों ने दावा किया कि सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक चले इस कार्यक्रम में चार काउंटरों पर कुल 17,067 लोगों का पंजीकरण हुआ। साथ ही लगभग 200 डॉक्टरों की मौजूदगी बताई गई। प्रचार में संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के चिकित्सकों की भागीदारी दिखाई दी।हालांकि, मौके पर मौजूद कई लोगों और स्थानीय सूत्रों का दावा आयोजकों के आंकड़ों से मेल नहीं खाता। एक स्थानीय पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पूरे आयोजन में करीब 600 लोगों की ही वास्तविक उपस्थिति रही। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि चार घंटे की अवधि में चार काउंटरों पर 17 हजार से अधिक पंजीकरण करना संभव नहीं लगता।यदि गणित लगाया जाए तो 240 मिनट में 17,067 पंजीकरण का मतलब है कि हर मिनट लगभग 71 लोगों का रजिस्ट्रेशन हुआ। यानी हर काउंटर पर प्रति मिनट करीब 17 से 18 लोगों का पंजीकरण। सवाल उठता है कि क्या इतनी तेज़ी से नाम, विवरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज करना संभव था?डॉक्टरों की मौजूदगी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कई मरीजों ने बताया कि बड़े संस्थानों के वरिष्ठ डॉक्टर मंच पर तो दिखे, लेकिन आम मरीजों के काउंटर पर परामर्श देते नजर नहीं आए। कुछ का आरोप है कि वे केवल विशेष लोगों को देखकर लौट गए। अधिकांश मरीजों को परामर्श आयुर्वेद और होम्योपैथी पद्धति के चिकित्सकों द्वारा दिया गया। मरीजों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि वास्तव में 100 से अधिक डॉक्टर सक्रिय रूप से परामर्श दे रहे थे, तो चार घंटे में 17 हजार मरीजों की जांच और उपचार कैसे संभव हुआ? औसतन हर डॉक्टर को प्रति घंटे सैकड़ों मरीज देखने पड़ते, जो कठिन प्रतीत होता है।फिलहाल यह मामला प्रशासन और संबंधित संस्थाओं की समीक्षा का इंतजार कर रहा है। क्या पंजीकरण और डॉक्टरों की संख्या से जुड़े दावों का सत्यापन होगा? या फिर यह मामला औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाएगा? स्वास्थ्य मेले की सफलता के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर अब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को और तेज कर रहा है।