आदेशों की सीमाएँ और शिक्षा की अनिवार्यता
✒️ हरिदयाल तिवारी
मोबाइल के बढ़ते उपयोग को लेकर सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्ताव लाना एक औपचारिक राजनीतिक कदम है, समाधान नहीं। ऐसे प्रस्ताव यह दिखाते हैं कि सत्ता समस्या को देख रही है, लेकिन यह नहीं बताते कि वह उसे समझ भी रही है। बच्चों के आचरण से जुड़ा प्रश्न न तो केवल कानूनी है और न ही प्रशासनिक; यह मूलतः शैक्षिक और सामाजिक प्रश्न है।
सरकारी प्रस्तावों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे आदेश को परिवर्तन का साधन मान लेते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में यह धारणा बार-बार विफल सिद्ध हुई है। बच्चों की आदतें नोटिस, निर्देश या प्रतिबंध से नहीं बदलतीं। वे उस वातावरण से बनती हैं जिसमें बच्चा पढ़ता है, खेलता है और संवाद करता है। जब वही वातावरण नीरस, दबावपूर्ण और विकल्पहीन हो, तो मोबाइल स्वाभाविक रूप से आकर्षण का केंद्र बन जाता है।
यह भी तथ्य है कि मोबाइल की लत किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। ऑनलाइन शिक्षा, अभिभावकों की व्यस्तता, खेल और सह-शैक्षणिक गतिविधियों का सिकुड़ना तथा विद्यालयों में संवादहीनता—इन सबने मिलकर इस समस्या को जन्म दिया है। यदि सरकार इन संरचनात्मक कारणों को संबोधित किए बिना केवल प्रतिबंधात्मक प्रस्ताव लाती है, तो वह समस्या की जड़ को छोड़कर उसकी परछाईं से लड़ रही होती है।
विधानसभा में पारित प्रस्तावों से न तो घर का अनुशासन तय होता है और न कक्षा का वातावरण। सरकार न हर परिवार की निगरानी कर सकती है, न शिक्षक की भूमिका निभा सकती है। इसके बावजूद जब ऐसे प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं, तो वे समाज में यह भ्रम पैदा करते हैं कि समाधान मिल गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि काम अभी शुरू भी नहीं हुआ।
आचरण परिवर्तन का मार्ग शिक्षा से होकर जाता है। इसके लिए पाठ्यक्रम में संतुलन, खेल और रचनात्मक गतिविधियों के लिए समय, शिक्षकों का निरंतर प्रशिक्षण और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। यदि नीति इन बिंदुओं पर केंद्रित नहीं है, तो प्रस्ताव केवल राजनीतिक वक्तव्य बनकर रह जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार आदेश की भाषा से बाहर निकलकर शिक्षा की भाषा सीखे। बच्चों को रोकने से पहले उन्हें बेहतर विकल्प देना होगा। अन्यथा हर नया प्रस्ताव कुछ दिनों तक चर्चा में रहेगा और फिर अगली खबर के साथ विस्मृत हो जाएगा।
निष्कर्ष स्पष्ट है—आचरण परिवर्तन शिक्षा से आता है, आदेश से नहीं। जब तक यह समझ नीति का आधार नहीं बनेगी, तब तक सरकारी प्रस्ताव समाधान नहीं, केवल औपचारिकता बने रहेंगे।