खराब कचरा प्रबंधन पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती।कचरा अब केवल शहरों की समस्या नहीं।
शहरीकरण और आधुनिकीकरण की होड़ में गांव देहात भी कचरे की समस्या को झेलने को मजबूर हो गए हैं। पर्यावरण के लिए घरों के निकलने वाले कूड़े से अधिक प्लास्टिक कचरा, मेडिकल कचरा, इलेक्ट्रॉनिक कचरा, ज्यादा नुक्सान देह है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर से हर रोज निकलने वाले करीब तीन लाख मैट्रिक टन कचरे में तमाम नये तरह के कूड़ा पैदा होने के चलते केवल एक चौथाई कूड़े का निबटान आसानी से हो रहा है। हिमालय की ऊंची चोटियों से लेकर पवित्र केदारनाथ धाम भी कचरा और खासकर प्लास्टिक कचरा से परेशान है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मन की बात में इसके लिए अपील किये। दिल्ली मुंबई या दूसरे बड़े शहरों में कचरों के पहाड़ लैंडफिल में लोगों को खतरा ही है।उसे खत्म करने के प्रयास के दौरान निकलने वाली गैस भी लोगों के लिए बीमारी की एक वजह बनी हुई है। जिस तरह से आए दिन दिल्ली के गाजीपुर भलस्वा ओखला या मुंबई के मुलुंड के कूड़े के पहाड़ में आग लगती रहती है प्लास्कटिक और दूसरे कचरों से समुद्री जीव मर रहे हैं। शहरों और देहातों में गाय और पालतू जानवरों की मौत का एक बड़ा कारण प्लास्टिक और मेडिकल सर्जरी कचरा है। उत्तराखंड के जंगलों में हाथियों की लीद में प्लास्टिक कचरा मिलने के बाद तो बन्य जीवों पर भी खतरा मंडराने लगा है। घरों से निकलने वाले कूड़े प्रबंधन एक समस्या ही हैं क्योंकि माना जाता है कि अगर अलग-अलग कूड़े की छंटाई शुरुआत में घरों से नहीं हुई तो बाद में उन्हें अलग-अलग करना बहुत कठिन हो जाता है। बड़ी समस्या अब घरों के तोड़ने से होने वाले मलबे को सड़क बनाने में उपयोग किया जाने लगा है। प्लास्टिक के पुराने बोतलों आदि को तो री सायकिल कर दूसरी चीजें बनने लगी हैं। बड़ी समस्या मेडिकल कूड़े की है, एक अनुमान के मुताबिक करोना महामारी के दौरान हर रोज 710 टन से अधिक मेडिकल कचरा निकल रहा था मेडिकल कचरे का सही तरीके से प्रबंधन न कर पाने पर तो उनमें आपस में ही रासायनिक प्रक्रिया शुरू होने से खतरनाक गैसों के निकलने की संभावना बढ़ जाती है।इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक कचरा मोबाइल टीवी फ्रिज एसी कूलर गीजर हीटर आदि घर घर तक पहुंच चुके हैं, उनके बेकार होने पर उनके पुराने सामानों को एक हद तक ही प्राकृतिक किया जा सकता है। समस्या इसलिए ज्यादा विकराल होती जा रही है कि हम जिन दुनिया के अमीर देशों की नकल कर के आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में फंसे हुए जा रहे हैं। वहां भी कचरा प्रबंधन समस्या है लेकिन वहां अपने देश जैसी न तो भारी आबादी और न ही कम संसाधन। कुछ दसक पहले तक कूड़ा प्रबंधन शहरों की समस्या थी, गांव में गिनती के पक्के मकान थे, मिट्टी या बांस फूस से नया मकान बनवाया जाता था। घरों से निकलने वाले कूड़े खाद बन जाते थे। क्यों कि उसमें मिलावटी चीजें नहीं या कम होती थी गांव में प्लास्टिक थैलियां बोतलों आदि का उपयोग तो कुछ दशकों पूर्व से शुरू हुआ।