" सरकार ने उच्च स्तरीय जांच में नियुक्ती वैध घोषित किया,
फिर बर्षो से महिला शिक्षक का उत्पीड़न क्यो ?
19 साल से वेतन बंद:
क्या यही है सुशासन?
क्या यही है “जीरो टॉलरेंस”?
बिहार में सुशासन और “जीरो टॉलरेंस” की नीति का ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन अगर उसी शासन में एक महिला शिक्षक को 19 वर्षों तक वेतन से वंचित रखा जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या सुनियोजित उत्पीड़न?
प्राथमिक विद्यालय अफ़ज़लपुर, शेरघाटी (गया) में पदस्थापित शिक्षिका शांति कुमारी का मामला किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था के संवेदनहीन चेहरे का आईना है।
सरकारी उच्च स्तरीय जांच में उनकी नियुक्ति को वैध घोषित किया जा चुका है। इसके बावजूद वेतन भुगतान के लिए बिल निर्माण तक नहीं किया जा रहा। आरोप है कि जिला शिक्षा पदाधिकारी स्तर पर “चढ़ावा” नहीं मिलने के कारण नियमावली को ताक पर रखकर फाइलों को दबाया जा रहा है।
यदि यह सच है — तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर प्रहार है।
अनुच्छेद 21 की अनदेखी?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। जब 19 वर्षों तक किसी कर्मचारी को उसका वैध वेतन नहीं दिया जाता, तो क्या यह उसके जीवन के अधिकार का उल्लंघन नहीं है?
क्या यह मानवाधिकार हनन नहीं है?
क्या यह महिला सम्मान पर सीधा आघात नहीं है?
जिम्मेदार कौन?
बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar बार-बार सुशासन की बात करते हैं। शिक्षा विभाग Government of Bihar के अधीन काम करता है। मगध प्रमंडल और गया जिला प्रशासन की जिम्मेदारी भी इससे अलग नहीं है।
तो फिर —
19 वर्षों की इस चुप्पी का जिम्मेदार कौन?
फाइलें क्यों रोकी गईं?
वेतन बिल क्यों नहीं बना?
दोषी अधिकारी अब तक सुरक्षित क्यों हैं?
अगर कुछ अनहोनी हो जाए तो?
यह सवाल सबसे भयावह है।
यदि बकाया वेतन के अभाव में महिला शिक्षक की तबीयत बिगड़ती है या कोई अप्रिय घटना घटती है — तो क्या सिर्फ संवेदना व्यक्त कर मामला खत्म कर दिया जाएगा?
इतिहास गवाह है —
प्रशासनिक उदासीनता कई बार जीवन ले लेती है, और फिर फाइलों में “जांच जारी है” लिख दिया जाता है।
यह सिर्फ शांति कुमारी का मामला नहीं
यह हर उस शिक्षक, हर उस कर्मचारी और हर उस नागरिक का मामला है जो व्यवस्था के सामने अकेला खड़ा है।
“जीरो टॉलरेंस” सिर्फ भाषणों में रहेगा या जमीन पर भी दिखेगा?
क्या बिहार में बिना घूस दिए कोई अपना वैध अधिकार पा सकता है?
अगर सरकार सचमुच संवेदनशील है, तो—
तत्काल बकाया वेतन भुगतान हो
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो
पीड़िता को मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से राहत मिले
वरना “सत्यमेव जयते” और “सुशासन” जैसे शब्द केवल दीवारों पर लिखे नारे बनकर रह जाएंगे।
न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक वेतन का नहीं — व्यवस्था की आत्मा का है।