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C R P F कार्यकाल की अवधि (Tenure of Posting) जाने अपना अधिकार लिखो आवेदन

सीआरपीएफ की नवीनतम स्थानांतरण नीति (Transfer Policy 2025-26) के मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं, जिन्हें आप जवानों को समझा सकते हैं:
​1. कार्यकाल की अवधि (Tenure of Posting)
​सॉफ्ट एरिया (Static/Peace): यहाँ सामान्यतः कार्यकाल 3 से 4 साल का होता है।
​हार्ड एरिया (Naxal/J&K): यहाँ कार्यकाल 3 साल का निश्चित है।
​अति-कठिन (Extreme Hard Area: यहाँ भी 3 साल का नियम है, लेकिन कार्यकाल पूरा होने के बाद 'चॉइस पोस्टिंग' का अधिकार प्राथमिकता पर मिलता है।
​2. चॉइस पोस्टिंग का अधिकार
​अगर किसी जवान ने लगातार दो हार्ड एरिया (HA) कार्यकाल पूरे किए हैं, तो वह अपनी पसंद के सॉफ्ट जोन या अपने गृह राज्य (Home State) के पास पोस्टिंग पाने का हकदार होता है।
​स्थानांतरण के समय जवान को 3 विकल्पों (Choices) को चुनने का अवसर दिया जाता है।
​3. मेडिकल और कंपैशनेट ग्राउंड (विशेष राहत)
​LMC (Low Medical Category): यदि कोई जवान घायल है या बीमार है, तो उसे उसकी मेडिकल स्थिति के अनुसार 'सॉफ्ट एरिया' में रखा जाना चाहिए।
​पारिवारिक समस्या: यदि माता-पिता, पत्नी या बच्चों को कोई गंभीर बीमारी है, तो जवान 'Compassionate Ground' पर ट्रांसफर के लिए आवेदन कर सकता है। इसके लिए मेडिकल बोर्ड के दस्तावेज जरूरी होते हैं।
​4. रोटेशन पॉलिसी (Rotation Policy)
​पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य है "समान वितरण"। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक जवान हमेशा दिल्ली में रहे और दूसरा हमेशा बस्तर में।
​अब 'सिंगल विंडो सिस्टम' और 'ऑनलाइन ट्रांसफर मॉड्यूल' का उपयोग हो रहा है ताकि पारदर्शिता रहे और बाबूगिरी या सेटिंग कम हो सके।
​5. विशेष श्रेणियां
​पति-पत्नी (Couple Case): यदि पति और पत्नी दोनों सरकारी सेवा में हैं, तो उन्हें एक ही स्टेशन या पास के स्टेशन पर रखने का प्रयास किया जाता है।
​सेवानिवृत्ति (Last Leg Posting): रिटायरमेंट से 2 साल पहले जवान को उसके गृह जिले या पसंद की जगह पर पोस्टिंग दी जाती है ताकि वह अपने भविष्य की योजना बना सके।
​जवानों के लिए आपकी 'लीगल' सलाह:
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​रिप्रेजेंटेशन (Representation): यदि ट्रांसफर गलत हुआ है, तो जवान को अधिकार है कि वह अपने कमांडेंट के माध्यम से IG (Admn) या DIG (Pers) को लिखित प्रतिवेदन दे।
​दस्तावेजीकरण: अपनी बीमारी या पारिवारिक समस्या के सारे कागज सरकारी अस्पताल से बनवाकर रखें, तभी दावे को मजबूती मिलती है।
​कोर्ट का रास्ता: अगर विभाग अपनी ही पॉलिसी का उल्लंघन करता है, तो आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है

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