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सरकारी अस्पताल की उस खिड़की पर जब 'स्टॉक नहीं है' का बोर्ड लटकता है, तो असल में वो एक गरीब की आखिरी उम्मीद पर ताला होता है। राज्यसभा के बजट सत्र में र

सरकारी अस्पताल की उस खिड़की पर जब 'स्टॉक नहीं है' का बोर्ड लटकता है, तो असल में वो एक गरीब की आखिरी उम्मीद पर ताला होता है। राज्यसभा के बजट सत्र में राघव चड्ढा ने उसी कड़वे सच को आवाज़ दी है, जिसे हम और आप हर रोज़ अस्पतालों की लंबी लाइनों में खड़े होकर महसूस करते हैं।

कहानी हर जगह एक जैसी ही है—अस्पताल के अंदर डॉक्टर जो पर्चा लिखता है, वो सरकारी दवाईखाने में कभी पूरा नहीं होता। कुछ सस्ती दवाइयां हाथ में थमा दी जाती हैं और जो महंगी या ज़रूरी होती हैं, उनके लिए सीधा रास्ता बाहर के प्राइवेट मेडिकल स्टोर का दिखाया जाता है। पूछने पर जवाब मिलता है कि 'पीछे से सप्लाई नहीं आ रही', जबकि असलियत कुछ और ही है।

लाखों की सैलरी लेने वाले कुछ जिम्मेदार लोग उन्हीं सरकारी दवाइयों को चोरी-छिपे बाहर बेचकर अपनी जेबें भर रहे हैं। एक बीमार आदमी, जिसके पास न कोई पोर्टल है और न कोई रसूख, वो 200-300 रुपये की दवाई के लिए किससे लड़ने जाए? वो बस अपनी बेबसी पर घूँट पीकर रह जाता है।

राघव चड्ढा ने संसद में यह सवाल उठाकर पूरे सिस्टम को आईना दिखाया है। जब तक गरीबों के हक की ये दवाइयां तिजोरियों में बंद रहेंगी, तब तक 'मुफ्त इलाज' का हर दावा सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रहेगा।

क्या आपको भी लगता है कि सरकारी अस्पतालों की ये 'बाहर वाली दवाई' की बीमारी का इलाज होना अब बहुत ज़रूरी है? क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ ऐसा हुआ है? अपनी बात कमेंट्स में बेबाकी से लिखें। ✍️ हक की बात, बिना किसी डर के!

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