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विवाह अवकाश: अविवाहित कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी क्यों?

सरकारी सेवा में अवकाश की व्यवस्था केवल सुविधा नहीं, बल्कि कर्मचारी के सामाजिक और पारिवारिक जीवन के सम्मान का प्रतीक होती है। मातृत्व अवकाश, पितृत्व अवकाश और शिशु देखभाल अवकाश जैसी व्यवस्थाएँ इस बात को स्वीकार करती हैं कि कर्मचारी केवल दफ्तर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक परिवार और समाज का भी अभिन्न अंग है।

लेकिन एक मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—जब विवाह ही जीवन की वह आधारशिला है, जिससे आगे परिवार की संरचना शुरू होती है, तो विवाह अवकाश को केंद्रीय नियमावली में स्पष्ट रूप से स्थान क्यों नहीं दिया गया?

भारतीय, विशेषकर सनातन परंपरा में विवाह कोई एक दिन का औपचारिक कार्यक्रम नहीं है। यह कई दिनों तक चलने वाला सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिवारिक उत्सव है। हल्दी, मेहंदी, वर-वधू की रस्में, आशीर्वाद समारोह—इन सबका सामाजिक महत्व है। ऐसे में 1–2 आकस्मिक अवकाश लेकर इस पवित्र संस्कार को निभाना व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता।

आजादी के दशकों बाद भी यदि अविवाहित कर्मचारियों के लिए विवाह अवकाश का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो यह विमर्श का विषय अवश्य है। यह केवल छुट्टी की मांग नहीं, बल्कि समान अवसर और समान संवेदनशीलता की अपेक्षा है।

यह मुद्दा भावनात्मक भी है और तार्किक भी। यदि व्यवस्था परिवार निर्माण के बाद की परिस्थितियों के लिए संवेदनशील है, तो परिवार की शुरुआत के अवसर पर भी समान संवेदनशीलता होनी चाहिए।

अब समय आ गया है कि इस विषय पर गंभीर, संगठित और सकारात्मक चर्चा हो—संवाद के माध्यम से, नीतिगत स्तर पर। अधिकारों की मांग संघर्ष से नहीं, बल्कि सशक्त तर्क और एकजुटता से आगे बढ़ती है। विवाह अवकाश का प्रश्न भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

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