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राज्यसभा में राघव चड्ढा ने आज उसी कड़वे सच पर चोट की है.

अस्पताल के बाहर परिवार किसी अपने की जान बचाने के लिए खड़ा है, और अंदर से डॉक्टर सिर्फ़ 'रिपोर्ट' नहीं, बल्कि 'लाखों का बिल' थमा देता है। राज्यसभा में राघव चड्ढा ने आज उसी कड़वे सच पर चोट की है, जिसे सुनकर हर मिडिल क्लास परिवार का दिल दहल जाता है।

प्राइवेट अस्पतालों की चकाचौंध के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है, जहाँ इलाज बाद में शुरू होता है और घर की जमा-पूंजी पहले खत्म हो जाती है। आज देश में हालात ये हैं कि किसी भी गंभीर बीमारी का मतलब सिर्फ़ शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि परिवार का आर्थिक रूप से खत्म हो जाना है। अपनों को बचाने की ज़िद में लोग अपने घर के गहने, पुरखों की ज़मीन और बरसों की मेहनत को दांव पर लगा देते हैं।

हैरानी की बात तो ये है कि हर साल भारत में लाखों हंसते-खेलते परिवार सिर्फ़ 'मेडिकल बिल्स' की वजह से गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं। जिस देश में इंसान को 'सांसें' खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़े, वहाँ विकास के आंकड़े थोथे नज़र आते हैं।

राघव चड्ढा ने संसद में एक ऐसा सवाल खड़ा किया है जिसने पूरे सिस्टम को आईना दिखाया है—"अगर हम 'वन नेशन, वन टैक्स' और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की बात कर सकते हैं, तो 'वन नेशन, वन मेडिकल ट्रीटमेंट' पर खामोश क्यों हैं?" 🇮🇳🏥

मकसद साफ़ है—इलाज की क्वालिटी आपकी बैंक बैलेंस पर नहीं, आपकी ज़रूरत पर तय होनी चाहिए। स्वास्थ्य सेवा कोई मुनाफे का धंधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अस्पतालों को 'कमाई का अड्डा' बनने से रोकना अब अनिवार्य हो चुका है।

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